ट्रम्प की सोच से आगे निकला ड्रैगन, US के आउटपुट से अपना सैन्य AI सिस्टम तैयार कर रहा चीन

New Delhi: अमेरिका और चीन के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की लड़ाई अब सिर्फ टेक कंपनियों तक सीमित नहीं रही. अब यह सीधे सैन्य ताकत से जुड़ गई है. चीन की सेना और उससे जुड़े रिसर्च संस्थान OpenAI और Anthropic जैसे अमेरिकी AI मॉडल के आउटपुट का इस्तेमाल करके अपने सैन्य AI सिस्टम तैयार कर रहे हैं. अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में चीन को हाई-एंड AI चिप्स और दूसरी संवेदनशील तकनीकों के निर्यात पर कई पाबंदियां लगाई हैं.

एक तरह का ‘शॉर्टकट’ बना लिया

मकसद था कि चीन अपने सैन्य AI कार्यक्रम को तेजी से आगे न बढ़ा सके. चीनी रिसर्च संस्थानों ने मॉडल डिस्टिलेशन को एक तरह का ‘शॉर्टकट’ बना लिया. यानी फ्रंटियर AI मॉडल खुद बनाने की जगह, अमेरिकी मॉडल से सीखकर घरेलू AI तैयार किया जा रहा है. सबसे बड़ी बात यह है कि यह सब ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका चीन को एडवांस AI चिप्स और दूसरी अहम तकनीकों से दूर रखने की कोशिश कर रहा है. रिपोर्ट ने 80 से ज्यादा चीनी रिसर्च पेपर और पेटेंट की समीक्षा की.

PLA और उससे जुड़े संस्थान

इनमें कई ऐसे दस्तावेज मिले, जिनसे पता चलता है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और उससे जुड़े संस्थान अमेरिकी AI मॉडल से मिले जवाबों का इस्तेमाल करके अपने छोटे लेकिन खास मकसद वाले AI मॉडल तैयार कर रहे हैं. पूरे विवाद की जड़ मॉडल डिस्टिलेशन नाम की तकनीक है. आसान भाषा में समझें तो पहले किसी बड़े और बेहद शक्तिशाली AI मॉडल, जैसे चैट जीपीटी या Claude, से सवाल पूछे जाते हैं. फिर उसके जवाब और सोचने के तरीके (Reasoning) को आधार बनाकर एक छोटा AI मॉडल तैयार किया जाता है.

नया मॉडल बनाने के लिए AI चिप्स की जरूरत नहीं 

इसका फायदा यह होता है कि नया मॉडल बनाने के लिए अरबों डॉलर के सुपरकंप्यूटर और हजारों हाई-एंड AI चिप्स की जरूरत नहीं पड़ती. कम कंप्यूटिंग पावर वाले सिस्टम पर भी यह मॉडल आसानी से चल सकता है. अमेरिका का आरोप है कि चीन इसी तरीके से उसके सबसे एडवांस AI मॉडल की क्षमता का फायदा उठा रहा है. PLA यूनिट 96941, जिसे सैन्य खुफिया और साइबर वॉरफेयर यूनिट माना जाता है, उसने OpenAI के GPT-3.5 का इस्तेमाल संवेदनशील सैन्य सोर्स कोड को समझने और उसका सार तैयार करने के लिए किया.

तकनीक से AI मॉडल तैयार

बाद में उसी आधार पर घरेलू मॉडल तैयार किया गया, जो पूरी तरह चीनी मिलिट्री नेटवर्क के अंदर चलता है. नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी ने इसी तकनीक से ऐसा AI मॉडल तैयार किया, जिसे ड्रोन पर चलाया जा सके. इससे ड्रोन से संपर्क टूटने की स्थिति में भी लाइव वीडियो देखकर लक्ष्य पहचान सकते हैं और नेविगेशन में मदद ले सकते हैं.

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