कोलंबो/बीजिंग: श्रीलंका, जिसे दुनिया भर में थेरवाद बौद्ध धर्म की प्राचीन परंपरा और गहरी आध्यात्मिक विरासत के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक ऐसे प्रभाव से गुजर रहा है जो बाहर से भले दिखाई न दे, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी धार्मिक और सामाजिक संरचना को प्रभावित कर सकता है. हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन श्रीलंका में बौद्ध धर्म को कूटनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, ताकि वहां अपनी वैचारिक और रणनीतिक पकड़ मजबूत कर सके.
सांस्कृतिक सहयोग के पीछे रणनीति
रिपोर्ट के अनुसार चीन श्रीलंका के कई प्राचीन बौद्ध मंदिरों के पुनर्निर्माण और संरक्षण के लिए आर्थिक सहायता दे रहा है. इसके अलावा बौद्ध तीर्थ यात्राओं को प्रायोजित करना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से खुद को बौद्ध विरासत का समर्थक बताने की कोशिश की जा रही है. पहली नजर में यह पहल सांस्कृतिक सहयोग और मित्रता का प्रतीक लगती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे एक व्यापक कूटनीतिक रणनीति भी छिपी हो सकती है.
धर्म के माध्यम से सॉफ्ट पावर
विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने धर्म और संस्कृति को अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ रणनीति का अहम हिस्सा बना लिया है. श्रीलंका जैसे देश में, जहां बौद्ध धर्म लोगों की पहचान और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है, वहां धार्मिक संस्थाओं के साथ जुड़ाव चीन को समाज के भीतर अपनी सकारात्मक छवि बनाने का अवसर देता है.
आर्थिक निवेश और बढ़ता प्रभाव
हंबनटोटा बंदरगाह जैसे बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के बाद चीन का प्रभाव श्रीलंका में पहले से ही बढ़ा है. अब रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक सहयोग के साथ-साथ डिजिटल अर्थव्यवस्था, तकनीकी ढांचे और प्रशासनिक सहयोग के माध्यम से भी चीन अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है. इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या आर्थिक निवेश के साथ वैचारिक प्रभाव भी बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों की चेतावनी
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तरह की कूटनीति को संतुलित तरीके से नहीं संभाला गया, तो श्रीलंका की पारंपरिक बौद्ध संस्थाओं पर बाहरी प्रभाव बढ़ सकता है. उनका कहना है कि बौद्ध धर्म की संस्थाएं सदियों से आध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र रही हैं, इसलिए उनकी स्वतंत्रता और मूल स्वरूप को बनाए रखना महत्वपूर्ण है.
कुल मिलाकर, चीन और श्रीलंका के बीच बढ़ते आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के बीच यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या यह सहयोग केवल विकास तक सीमित है या इसके पीछे व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति भी काम कर रही है.

