कश्मीरी पंडितों के पलायन से ध्यान हटाने के लिए PAK मनाता है ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’,PoJK कार्यकर्ता ने खोली पोल

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New Delhi: पाकिस्तान इस साल भी 5 फरवरी को ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी डे’ मनाने जा रहा है. आधिकारिक तौर पर यह कश्मीरियों के अधिकारों के लिए एक दिन बताया जाता है, लेकिन अब पाकिस्तान की पोल खुल गई है. खुलासा हुआ है कि यह दिन पाकिस्तान की अपनी मानवाधिकारों की स्थिति और शासन की विफलताओं को छिपाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह दिन पाकिस्तानी सेना को ‘कश्मीर की रक्षा करने वाला’ दिखाने की कोशिश है.

धोखाधड़ी और प्रोपेगैंडा

पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) के राजनीतिक कार्यकर्ता अमजद अय्यूब मिर्जा ने इसे धोखाधड़ी और प्रोपेगैंडा करार दिया हैं. मिर्जा ने एक वीडियो बयान में कहा कि कश्मीर सॉलिडैरिटी डे की शुरुआत 1990 में हुई थी, जब जमात-ए-इस्लामी के नेता काजी हुसैन अहमद ने इसे शुरू किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इसे मंजूरी दी.

पंडितों के पलायन पर ध्यान हटाना मकसद

यह घोषणा कश्मीरी पंडितों के वैली से निर्वासन के कुछ ही हफ्ते बाद हुई थी, जिससे मिर्जा को शक है कि इसका मकसद उस समय की हिंसा और पंडितों के पलायन पर ध्यान हटाना था. मिर्जा का दावा है कि पाकिस्तान इस दिन का उपयोग PoJK और Gilgit-Baltistan (PoGB) में अपनी मानवाधिकार हनन, भ्रष्ट शासन और संसाधनों की लूट को छुपाने के लिए करता है.

PoJK और PoGB पर बात क्यों नहीं करता PAK

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पाकिस्तान कश्मीरियों के अधिकारों को लेकर चिंतित है तो फिर PoJK और PoGB में मानवाधिकारों की स्थिति पर क्यों नहीं बात करता? मिर्जा ने 5 फरवरी को “हाइपोक्रेसी का प्रतीक” बताया और कहा कि यह दिन पाकिस्तानी सेना को “कश्मीर की रक्षा करने वाला” दिखाने की कोशिश है.

भारत में शामिल होने का निर्णय

उन्होंने फिर से यह दावा किया कि जम्मू-कश्मीर ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत से “इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसन” पर हस्ताक्षर कर भारत में शामिल होने का निर्णय लिया था. अंत में मिर्जा ने कहा कि PoJK में अब बहुत से लोग कश्मीर सॉलिडैरिटी डे नहीं मानते. वे मानते हैं कि PoJK को ही अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की जरूरत है, क्योंकि भारतीय प्रशासन वाले क्षेत्र की तुलना में PoJK और PoGB में विकास बहुत कम है.

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