मंगल ग्रह पर बिना ईंट और सरिया के बनेंगे घर, वैज्ञानिकों ने खोज निकाला क्रांतिकारी बायोटेक्नोलॉजी

Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

mars shelter problem solved: मंगल ग्रह पर इंसानी बस्ती बसाने की राह में सबसे बड़ी चुनौती वहां रहने के लिए घर बनाना था, लेकिन वैज्ञानिकों ने अब इसका भी तोड़ खोज निकाला है. एक नई रिसर्च के मुताबिक, महज इंजीनियर यीस्ट, जिलेटिन और मंगल की स्थानीय रेत के इस्तेमाल से बेहद मजबूत और रेडिएशन-प्रूफ शेल्टर तैयार किए जा सकते हैं. इस क्रांतिकारी बायोटेक्नोलॉजी से वैज्ञानिक भी हैरान है.

दरअसल, हांगकांग के वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने जेनेटिकली इंजीनियर किए गए यीस्ट, जिलेटिन और रेत से एक सस्ता और तेजी से बनने वाला ‘लिविंग’ निर्माण मटीरियल बनाया है, जिसे मंगल ग्रह जैसे माहौल में 3D प्रिंट किया जा सकता है. वैज्ञानिकों की यह स्टडी ‘केम सर्कुलैरिटी’ नाम के एक इंटरनेशनल ‘सेल प्रेस’ जर्नल में ऑनलाइन छपी थी. इसमें एक ऐसे बायोलॉजिकल बाइंडर के बारे में बताया गया है जो दानेदार मटीरियल को आपस में जोड़े रखता है.

1000 डिग्री तापमान और भारी मशीनों की जरूरत खत्म

वैज्ञानिकों ने बताया कि पृथ्वी पर घर बनाने के लिए कंक्रीट और भारी मशीनों की आवश्यकता होती है जिन्हें मंगल ग्रह तक ले जाना लगभग नामुमकिन है. इसके अलावा पारंपरिक तरीकों में पत्थरों या खनिजों को 1000 डिग्री सेल्सियस तक गर्म करना पड़ता है जिसमें काफी ऊर्जा खर्च होती है. ऐसे में हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर किउ जिशेन और उनकी टीम ने इस चुनौती का तोड़ इंजीनियर यीस्ट, जिलेटिन और मंगल की स्थानीय बालू के कॉम्बिनेशन से निकाला है.

कितना मजबूत होगा यह ‘बायो-हाउस’?

  • वैज्ञानिकों की इस नई सामग्री का कंप्रेसिव स्ट्रेंथ 12 मेगापास्कल (MPa) मापा गया है. यह आम निर्माण सामग्रियों के बराबर और सामान्य मिश्रण से लगभग 170% ज्यादा मजबूत है.
  • यीस्ट कोशिकाओं, जिलेटिन और बालू के कणों को आपस में जोड़ने के लिए वैज्ञानिकों ने सी-फूड (मसेल) के चिपचिपे प्रोटीन का उपयोग किया है.
  • मंगल के कम दबाव और शून्य से 50 डिग्री नीचे के तापमान में यह मिश्रण सूखकर बेहद मजबूत और छिद्रपूर्ण ढांचा बना लेता है.
  • प्रयोगशाला में मंगल जैसा कृत्रिम माहौल यानि माइनेस 30 डिग्री तापमान और 0.01 वायुमंडलीय दबाव बनाकर 3D प्रिंटर के जरिए इस मटेरियल से एक छोटा ढांचा सफलतापूर्वक प्रिंट किया गया.

सिर्फ 1 घंटे की सौर ऊर्जा में तैयार होगा 1 क्यूबिक मीटर शेल्टर

बता दें कि मंगल की मिट्टी को पिघलाकर ईंट बनाने में कई दिन लगते है. वहीं इस बायोलॉजिकल तकनीक से महज 1 घंटे की सोलर पावर क्षमता का इस्तेमाल कर 1 क्यूबिक मीटर मजबूत निर्माण सामग्री तैयार की जा सकती है.

साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक, इस सामग्री को फिर से रिसाइकल भी किया जा सकता है. चौथे रीसाइक्लिंग चक्र के बाद भी इसकी मजबूती 11.8 MPa बनी रहती है. प्रोफेसर किउ के मुताबिक, 1 क्यूबिक मीटर निर्माण सामग्री के लिए पृथ्वी से महज कुछ किलोग्राम कच्चा माल जिलेटिन और यीस्ट ले जाने की आवश्यकता होगी.

अंटार्कटिका में भी हो सकता है इस्तेमाल

वही अगर भविष्य में मंगल पर मौजूद मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और बर्फ को जिलेटिन या न्यूट्रिएंट्स में बदलने की तकनीक विकसित हो जाती है तो पृथ्वी से कच्चा माल ले जाने की जरूरत खत्म हो जाएगी. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक केवल मंगल ग्रह तक ही सीमित नहीं रहेगी. इसका इस्तेमाल पृथ्वी पर अंटार्कटिका जैसे बेहद ठंडे और दूरदराज के रिसर्च स्टेशनों का निर्माण करने के लिए भी किया जा सकता है.

Latest News

गोपाल दास ‘नीरज’ की स्मृति में दिल्ली में ‘कारवाँ गीतों का…’ LIVE: CMD उपेन्‍द्र राय ने महाकवि को ऐसे किया याद

राजधानी दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया स्थित मावलंकर हॉल में आज महाकवि गोपाल दास ‘नीरज’ की स्मृति में...

More Articles Like This

Exit mobile version