चांद की बर्फ अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बनेगा पानी, सांस और ईंधन…अंतरिक्ष में इतिहास रचने के करीब NASA-ISRO

Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

NASA ISRO Moon Base: अमेरिका चांद पर स्थायी या लंबे समय तक काम करने के लिए इंसानी ठिकाने की तलाश में है, जिसके लिए वो चांद की सतह पर ठिकाना, वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं और जरूरी संसाधनों की व्यवस्था करने में जुटा हुआ है. हालांकि इसके लिए चांद का हर हिस्सा उपयोगी नहीं होगा. ऐसे में वैज्ञानिकों की नजर चांद के ध्रुवीय क्षेत्रों पर है. दरअसल, यहां ऐसे इलाके हैं जहां सूरज की रोशनी बहुत कम पहुंचती है. वहीं, इन क्षेत्रों में बर्फ मौजूद होने के भी संकेत मिले हैं. ऐसे में भविष्य के मून बेस के लिए यही बर्फ सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक बन सकती है.

दरअसल, वैज्ञानिकों ने चांद के कुछ ऐसे गड्ढों की पहचान की है, जहां सूरज की रोशनी अरबों साल से लगभग नहीं पहुंची है. इन बेहद ठंडे इलाकों में पानी बर्फ के रूप में मौजूद हो सकता है. यदि भविष्य के अंतरिक्ष यात्री इस बर्फ को निकालने में सफल होते हैं तो चांद पर जीवन की सबसे बड़ी जरूरत पूरी हो सकती है.

पानी से बनेगा ऑक्सीजन और ईंधन

पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों होते हैं, जिसे बिजली की मदद से पानी को इन दोनों तत्वों में अलग किया जा सकता है, जिससे ऑक्सीजन अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सांस लेने में काम आएगी. वहीं हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को रॉकेट ईंधन के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. अर्थात चांद की बर्फ भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए पानी, सांस और ईंधन- तीनों का स्रोत बन सकती है. यही वजह है कि चांद पर स्थायी ठिकाना बनाने की योजनाओं में ध्रुवीय इलाकों को इतना महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

मून बेस को लेकर सहयोग का प्रस्ताव आया सामने

आपको बता दें कि आर्टेमिस समझौते का मकसद चांद और दूसरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए शांतिपूर्ण और जिम्मेदार अंतरिक्ष अन्वेषण के साझा सिद्धांत विकसित करना है. इसी साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाने के लिए अब नासा ने बेंगलुरु में 5 और 6 अगस्त को हुई भारत-अमेरिका सिविल स्पेस ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप की बैठक में प्रस्ताव दिया है.

इसके अलावा निसार मिशन भी भारत-अमेरिका अंतरिक्ष साझेदारी का एक बड़ा उदाहरण है. इस उपग्रह को नासा और इसरो ने मिलकर तैयार किया. यह पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए अत्याधुनिक रडार तकनीक का इस्तेमाल करता है. इस मिशन को दोनों एजेंसियों के बीच सफल संयुक्त परियोजना के तौर पर देखा जा रहा है.

क्या है नासा का अगला कदम? 

बता दें कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इंसानों को दोबारा चांद पर भेजने के लिए आर्टेमिस कार्यक्रम शुरू किया है. इसके तहत अब तक दो शुरुआती मिशन हो चुके हैं. जिसमें नवंबर 2022 में पहला मिशन बिना इंसान के चांद के आसपास गया था. इसके बाद एक मानवयुक्त मिशन ने चांद के चारों ओर उड़ान भरी, लेकिन उस दौरान चांद पर लैंडिंग नहीं हुई. अब नासा का लक्ष्य करीब 2028 में इंसानों को फिर चांद की सतह पर उतारना है.

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