पाकिस्तान की कमजोरी का प्रतीक बना नूर खान एयरबेस, ईरान-US मध्यस्थता से मुनीर का दोहरा चरित्र उजागर

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New Delhi: भारत के ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस हमलों से क्षतिग्रस्त हुआ पाकिस्तान का नूर खान एयरबेस एक बार फिर सुर्खियों में है. आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने इस बेस को ढाल बनाने की कोशिश की लेकिन यह अब पाकिस्तान की कमजोरी का प्रतीक बन गया है. ये पाकिस्तान के दोहरे चेहरे का सिंबल बन गया है, जो कभी भी पाला बदल सकता है.

ईरानी सैन्य विमानों को छिपाने की रिपोर्ट्स

भारत के ब्रह्मोस मिसाइल हमलों से हुए घावों को ढकने के लिए मुनीर ने जो रणनीति अपनाई, वह अब उल्टी पड़ रही है. नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों को छिपाने की रिपोर्ट्स ने पाकिस्तान को बुरी तरह फंसा दिया है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस का प्लेन उसी रनवे पर उतारा गया, जहां ईरान के जेट छिपे हुए थे. ये रिपोर्ट सच निकली तो यह घटनाक्रम पाकिस्तान को महागद्दार साबित करने वाला है.

सैन्य विमानों को पाकिस्तान में छिपाया

वैसे पहले भी पाकिस्तान ऐसा ही कर चुका है लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुचकार पर पहली बार इस देश ने उन्हें अपनी औकात दिखाई है. हालिया रिपोर्ट बताती है कि ट्रंप द्वारा अप्रैल में ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा के कुछ दिन बाद ही ईरान ने अपने सैन्य विमानों को पाकिस्तान में छिपाया. जिन विमानों को पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर पार्क करवा दिया, उनमें RC-130 टोही विमान भी शामिल है.

वाशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ

ईरान अमेरिकी या इजरायली हमलों से अपने एसेट्स को बचाना चाहता था और इसमें उसका साथ दिया पाकिस्तान ने. ये वही पाकिस्तान है, जो खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच मध्यस्थ बता रहा था, वो हौले से ईरानी खेमे में सरक गया. पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए इसे डेलिगेशन लॉजिस्टिक्स बताया, लेकिन तथ्य कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. इस बीच आसिम मुनीर की दोहरी छवि भी चर्चा में रही.

मध्यस्थ की भूमिका पर पुनर्विचार की मांग

ईरानी डेलिगेशन का स्वागत करते समय वे कॉम्बैट गियर में थे, जबकि जेडी वैंस के आने पर सूट-बूट में. अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पाकिस्तान की इस भूमिका पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने मध्यस्थ की भूमिका पर पुनर्विचार की मांग की और कहा कि पाकिस्तान की निष्पक्षता पर संदेह है. ग्राहम की टिप्पणियों ने वाशिंगटन में पाकिस्तान के प्रति बढ़ते अविश्वास को रेखांकित किया. ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से चले आ रहे हैं- साझा सीमा, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन के नाम पर.

अमेरिका, पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी

साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद भी दोनों देशों ने एक-दूसरे को समर्थन दिया, लेकिन अमेरिका, पाकिस्तान का प्रमुख सहयोगी रहा है. वो उससे अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद, F-16 जैसे हथियार और आतंकवाद के खिलाफ साझा अभियान चलाता रहा है. बावजूद इसके पाकिस्तान ईरान को शरण दे रहा है. ये उसकी नीयत पर सवाल उठाता है.

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