Iran vs Israel-US War: अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद ईरान ने सऊदी अरब समेत खाड़ी देशों पर जवाबी कार्रवाई की. ऐसे में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता अब सवालों के घेरे में आ गया है. शहबाज शरीफ और मोहम्मद बिन सलमान के बीच हुआ यह समझौता इस आधार पर था कि किसी एक देश पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा. इसे NATO जैसे मॉडल की तरह पेश किया गया था. इस समझौते की असली परीक्षा हुई।
गठबंधन सिर्फ कागजों तक ही सीमित
इस बड़े संकट के बावजूद पाकिस्तान ने सऊदी अरब के समर्थन में कोई खुली सैन्य कार्रवाई नहीं की. इससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह गठबंधन सिर्फ कागजों तक ही सीमित था दरअसल में पाकिस्तान इस समय अपनी पश्चिमी सीमा पर व्यस्त है, जहां अफ़ग़ानिस्तान के साथ तनाव बढ़ा हुआ है. वहां सैन्य ऑपरेशन तेज हो गए हैं और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं.
घरेलू हालात को प्राथमिकता
पाकिस्तान सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए उसे घरेलू हालात को प्राथमिकता देनी पड़ रही है. विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर संतुलित रुख अपनाया है. एक तरफ वह सऊदी अरब के साथ रिश्ते बनाए रखना चाहता है तो दूसरी तरफ ईरान के साथ खुला टकराव भी नहीं चाहता. यही कारण है कि पाकिस्तान की भूमिका अब सक्रिय सहयोगी के बजाय सावधान पर्यवेक्षक जैसी दिख रही है.
PAK की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी असर
सऊदी अरब ने इस समझौते में काफी निवेश किया था और इसे अपनी सुरक्षा का मजबूत स्तंभ माना था. लेकिन मौजूदा हालात में उसे अब अपने रक्षा विकल्पों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है. खासतौर पर पश्चिमी देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की दिशा में. इस पूरे घटनाक्रम का असर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है. अन्य देश अब उसके रक्षा समझौतों पर भरोसा करने से पहले सोच सकते हैं. उसकी रणनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं.
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