Sea Water: चीनी वैज्ञानिकों ने सूरज की रोशनी से चलने वाली एक ऐसी तकनीक (फोटोथर्मल मटीरियल) विकसित की है, जो जीरो यूटिलिटी एनर्जी कॉस्ट के समंदर के पानी को मीठा बना देती है. खास बात यह है कि लगातार दो साल के टेस्ट के आधार पर वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि इस तकनीक से पानी तैयार करने की लागत, बाजार में बिकने वाले बोतलबंद पानी से भी कम आएगी.
1 दिन में मिलेगा 20 लीटर मीठा पानी
वैज्ञानिकों ने इस टेक्नोलॉजी को असल जिंदगी में परखने के लिए 0.75 स्क्वायर मीटर का एक छोटा सा ट्रायल सिस्टम बनाया. इसमें एक छोटे सोलर पैनल से चलने वाला पंखा लगाया गया, जिसने नेचुरल सनलाइट की मदद से समंदर के पानी को भाप में बदला और फिर उसे मीठे पानी में तब्दील कर दिया. परिणामस्वरूप इस छोटे से पैनल ने एक दिन में 20 लीटर से ज्यादा पीने लायक पानी बनाया, जो 10 लोगों की रोजमर्रा की प्यास बुझाने के लिए काफी है.
‘बटन और धागे’ से आया था आइडिया
बता दें कि इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोसेस इंजीनियरिंग (IPE) के मुताबिक, यह पानी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पीने योग्य पानी के मानकों पर पूरी तरह खरा उतरा है. चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के IPE और शेनझेन यूनिवर्सिटी की टीम ने बताया कि सोलर एनर्जी से पानी साफ करने की टेक्नोलॉजी में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि धूप सोखने वाले बारीक कण आटे की तरह चिपक जाते थे या तेज धूप में चटक जाते थे. इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने कपड़ों में लगने वाले ‘बटन और धागे’ का तरीका अपनाया.
खारे पानी में उगाई मक्का और पालक
खास बात ये है कि इस डिवाइस की कामयाबी सिर्फ पीने के पानी तक सीमित नहीं रही. ट्रायल साइट पर बने इसी मीठे पानी का इस्तेमाल 5 स्क्वायर मीटर के खेत में किया गया. बिना किसी बाहरी बिजली ग्रिड के, सिर्फ सूरज की रोशनी के दम पर पालक, मक्का और चीनी गोभी की फसल पूरी तरह से उगाकर दिखाई गई. सिस्टम की मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि समुद्री तूफानों जैसे हालात परखने के लिए इसे खारे पानी में 450 RPM की स्पीड पर 30 दिनों तक लगातार घुमाया गया. माइक्रोस्कोप से देखने पर पता चला कि इसका एक भी कण अपनी जगह से नहीं हिला था.
ऐसे में साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिर्पोट के मुताबिक, चीन की यह नई 0-इलेक्ट्रिसिटी तकनीक इसी महंगे सिस्टम के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर मानी जा रही है. IPE की टीम अब पानी को भाप से तरल बनाने की क्षमता को और बेहतर करने पर काम कर रही है. उनका लक्ष्य इस तकनीक को बड़े पैमाने पर ऐसे तटीय इलाकों, दूर-दराज के द्वीपों और क्षेत्रों तक पहुंचाना है, जहां पानी की भारी किल्लत रहती है.