पुतिन की18 महीने की मेहनत हुई विफल, सीरिया ने छीने रूस के मिलिट्री बेस

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Syria Russia Military Base: कुछ समय पहले सीरिया में रूस का दबदबा था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं. 18 महीने तक चली बातचीत के बाद भी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सीरिया की नई सरकार को अपने पक्ष में पूरी तरह नहीं झुका पाए. ऐसे में रूस को अपने सबसे अहम सैन्य ठिकानों से पीछे हटकर समझौता करना पड़ा है और अब उसे धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी समेटनी पड़ेगी.

दरअसल, सीरिया और रूस के बीच हुए नए समझौते के तहत ख्मीमीम एयरबेस और तर्तूस पोर्ट पर रूस की पुरानी पकड़ खत्म कर दी गई है. पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे ख्मीमीम एयरपोर्ट और तर्तूस पोर्ट का चौथा कमर्शियल बर्थ अब धीरे-धीरे सीरियाई सरकार के नियंत्रण में जाएंगे. वहीं सैन्य फैसिलिटीज को पारंपरिक बेस के बजाय ‘संयुक्त प्रशिक्षण केंद्र’ में बदला जाएगा. अर्थात यहां दोनों देश साथ में मिलिट्री ट्रेनिंग करेंगे. यह पूरा ट्रांजिशन अगले तीन महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.

रूस के सामने सीरिया रख रहा शर्तें

इसके अलावा, सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद का जब तख्तापलट हुआ तो रूस ने ही उन्हें शरण दी थी. वहीं, रूसी सैनिक भी धीरे-धीरे यहां से निकलने लगे. बशर के दौर के विरोधी सीरिया की सत्ता में बैठकर रूस को लेकर शर्तें तय कर रहे हैं. अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा, जो कभी असद विरोधी आंदोलन का चेहरा थे और जिन पर एक समय अमेरिका ने इनाम तक घोषित किया था, अब उसी सिस्टम के प्रमुख बनकर रूस जैसे ताकतवर देश को अपने हिसाब से समझौता करने पर मजबूर कर रहे हैं.

कमजोर हुई रूस की सैन्य पकड़

इतना ही नहीं, लताकिया के पास ख्मीमीम एयरबेस और तर्तूस का नौसैनिक अड्डा रूस के लिए पूर्वी भूमध्य सागर में सबसे अहम सैन्य ठिकाने रहे हैं. सीरियाई युद्ध के दौरान यही ठिकाने रूस की ताकत का कारण थे. लेकिन अब अड्डों की प्रकृति बदल रही है. सीधे सैन्य नियंत्रण की जगह यहां साझा प्रशिक्षण केंद्र बनाए जा रहे हैं, जो साफ संकेत है कि रूस की स्वतंत्र सैन्य पकड़ कमजोर हुई है और सीरिया ने अपनी जमीन पर नियंत्रण वापस लेना शुरू कर दिया है, जिसका ऐलान भी सीरिया ने कर दिया, लेकिन रूस की ओर से अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. यह खामोशी अपने आप में संकेत देती है कि मॉस्को इस बदलाव को लेकर पूरी तरह सहज नहीं है या फिर वह इसे धीरे-धीरे स्वीकार करने की रणनीति अपना रहा है.
सीरिया की नई सत्ता सिर्फ रूस के साथ समीकरण नहीं बदल रही, बल्कि वह पश्चिमी देशों के साथ भी तेजी से रिश्ते सुधार रही है. अमेरिका ने पहले ही कई प्रतिबंध हटाए हैं और अब रिश्तों को सामान्य करने की प्रक्रिया चल रही है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस अहमद अल-शरा को कभी आतंकवादी माना जाता था और जिन पर इनाम तक रखा गया था, आज वही अमेरिकी नेतृत्व के साथ बैठकर बातचीत कर रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता भी उनसे मुलाकात कर रहे हैं, जो इस पूरे बदलाव की दिशा को साफ दिखाता है.

सीरिया की नई रणनीति

यह डील सिर्फ रूस से दूरी बनाने की नहीं, बल्कि संतुलन बनाने की रणनीति का हिस्सा है. सीरिया अब रूस, अमेरिका, यूरोप और अरब देशों-सभी के साथ रिश्ते साधने की कोशिश कर रहा है. 18 महीने की बातचीत के बाद सामने आया यह समझौता दिखाता है कि सीरिया अब युद्ध के दौर से निकलकर कूटनीति के नए खेल में उतर चुका है, जहां पुराने रिश्ते नहीं, बल्कि मौजूदा हित तय कर रहे हैं कि कौन कितना ताकतवर है.
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