US-Venezuela Relation: वेनेजुएला में अमेरिका के हमले की दुनियाभर में निंदा हो रही है. अमेरिकी सेना ने न सिर्फ वेनेजुएला पर हमला किया, बल्कि पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क लेकर आ गई. इस मामले में भारत ने दोनों पक्षों से बातचीत के जरिए विवाद को हल करने के लिए कहा है. इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने भारत सरकार से अमेरिका के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की है.
‘‘देश की आजादी को रौदने की किसी को इजाजत नहीं’’
सीपीआई के नेशनल सेक्रेटेरिएट ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा कि “सीपीआई वेनेजुएला के लोगों और वहां की सही सरकार के साथ अपनी एकजुटता दोहराती है और दुनिया भर की तरक्कीपसंद ताकतों से साम्राज्यवाद, सैन्यवाद और नव-औपनिवेशिक हमले के खिलाफ एकजुट होने की अपील करती है. साम्राज्यवाद को बिना किसी सजा के अंतर्राष्ट्रीय कानून और देश की आजादी को रौंदने की इजाजत नहीं दी जा सकती.”
राष्ट्रपति को किडनैप करना सरकारी आतंकवाद से कम नहीं
अमेरिकी कार्रवाई को आतंकवाद करार देते हुए सीपीआई ने कहा कि “किसी विदेशी ताकत द्वारा मौजूदा राष्ट्रपति को किडनैप करना सरकारी आतंकवाद से कम नहीं है. यह एक खतरनाक मिसाल कायम करता है जो सभी विकासशील देशों की संप्रभुता के लिए खतरा है. अगर ऐसे काम आम हो जाते हैं, तो ग्लोबल साउथ का कोई भी देश साम्राज्यवादी दबाव, शासन बदलने के ऑपरेशन और मिलिट्री धमकी से सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता.”
सीपीआई ने भारत से की ये मांग
सीपीआई ने मांग की है कि भारत सरकार तुरंत अपना गोलमोल और साम्राज्यवाद समर्थित रवैया छोड़े और वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिका के हमले की साफ तौर पर निंदा करे. भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून, राष्ट्रीय संप्रभुता और लोगों के बिना किसी बाहरी दखल के अपने राजनीतिक और आर्थिक सिस्टम तय करने के अधिकार के बचाव में अपनी आवाज उठानी चाहिए.
गैर-कानूनी कामों के सामने चुप रहना मिलीभगत के बराबर
पार्टी ने आगे कहा कि भारत को गुटनिरपेक्ष देशों, लैटिन अमेरिका, ग्लोबल साउथ और साम्राज्यवादी दबदबे का विरोध करने वाले सभी देशों के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए. इस तरह के खुलेआम गैर-कानूनी कामों के सामने चुप रहना मिलीभगत के बराबर है.
पार्टी ने अपने बयान में कहा कि “भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारत सरकार के इस अहम मुद्दे पर अपनी गहरी चिंता और गुस्सा जाहिर करती है, जिसने चुप रहना चुना है और असल में, इस अहम मुद्दे पर खुद को अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ जोड़ लिया है. ऐसा रवैया भारत के गुटनिरपेक्षता, साम्राज्यवाद-विरोधी, उपनिवेशवाद-विरोधी और ग्लोबल साउथ के दबे-कुचले देशों के साथ एकजुटता के ऐतिहासिक वादे से एक शर्मनाक बदलाव दिखाता है.”
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