Washington: पश्चिम एशिया में तनाव और ग्लोबल ऑयल मार्केट में दबाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को बड़ा ऐलान किया है. ट्रंप ने कहा है कि वह अगले कुछ दिनों में उन चीनी तेल कंपनियों पर लगे प्रतिबंध हटाने को लेकर फैसला ले सकते हैं, जो ईरान से तेल खरीद रही हैं. ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति और तेल बाजार में हलचल तेज हो गई है. अगर अमेरिका ये प्रतिबंध हटाता है तो चीन और ईरान के बीच तेल कारोबार को बड़ी राहत मिल सकती है.
ईरान की तेल आमदनी को सीमित करने की कोशिश
बता दें कि अमेरिका लंबे समय से ईरान की तेल आमदनी को सीमित करने की कोशिश करता रहा है. इसी रणनीति के तहत ट्रंप प्रशासन ने मैक्सिमम प्रेशर कैंपेन चलाया था, जिसका मकसद ईरान की कमाई के बड़े स्रोतों को रोकना था. इसके तहत उन कंपनियों और देशों पर भी नजर रखी गई जो ईरान से तेल खरीदते रहे, लेकिन चीन लगातार ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है. यही वजह है कि ट्रंप के ताजा बयान ने बाजार में नई बहस शुरू कर दी है.
क्या अमेरिका चीन पर कम करेगा दबाव?
अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका चीन पर दबाव कम करेगा या फिर और सख्त रुख अपनाएगा. अगर अमेरिकी प्रशासन चीनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों में ढील देता है तो इससे ईरानी तेल की सप्लाई अंतरराष्ट्रीय बाजार में और बढ़ सकती है. इसका असर सीधे क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ सकता है. सप्लाई बढ़ने से तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है और एशियाई देशों को कुछ राहत मिल सकती है.
ग्लोबल एनर्जी मार्केट में अनिश्चितता
दूसरी तरफ अगर अमेरिका सैंक्शंस और सख्त करता है तो चीन-अमेरिका तनाव और बढ़ सकता है. इससे ग्लोबल एनर्जी मार्केट में अनिश्चितता बढ़ेगी और तेल सप्लाई को लेकर नई चिंता पैदा हो सकती है. 2025 के आंकड़ों के मुताबिक चीन रोजाना लगभग 13.8 लाख बैरल ईरानी तेल खरीदता है. यह ईरान के कुल समुद्री तेल निर्यात का 80% से ज्यादा हिस्सा माना जाता है. यही वजह है कि चीन को ईरानी तेल का सबसे बड़ा और सबसे स्थिर खरीदार माना जाता है.
ईरानी तेल भी अहम
चीन के लिए ईरानी तेल इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उसे अपेक्षाकृत सस्ता क्रूड उपलब्ध कराता है. ऐसे समय में जब दुनिया में ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बनती जा रही है, चीन अपने लिए हर संभव सप्लाई लाइन बनाए रखना चाहता है.
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