अब बच्चों के लिए शुरू होगा बुकर अवॉर्ड, इस उम्र के लेखकों का भी होगा सम्मान

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Children’s Booker Prize : दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों में गिने जाने वाले बुकर प्राइज को लेकर एक नई घोषणा की गई है. बता दें कि 24 अक्‍टूबर को बुकर प्राइज फाउंडेशन ने बताया कि अब से यह पुरस्कार सिर्फ वयस्क लेखकों तक सीमित नहीं रहेगा. बल्कि वयस्‍क लेखकों के साथ बच्चों के लिए भी एक नया अवॉर्ड शुरू किया जा रहा है. उन्‍होंने ये भी बताया कि इसका नाम ‘चिल्ड्रन्स बुकर प्राइज’ होगा. प्राप्‍त जानकारी के अनुसार यह फैसला साहित्य की दुनिया में एक बड़ा कदम होने के साथ उन बच्चों के लिए भी एक शानदार अवसर है जो छोटी उम्र में ही कहानियों की दुनिया में कदम रखना चाहते हैं.

इस दौरान बुकर प्राइज फाउंडेशन के अनुसार, यह नया पुरस्कार 8 से 12 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए होगा. इसके साथ ही इस अवॉर्ड के तहत किसी भी देश का बच्चा हिस्सा ले सकता है. लेकिन उसकी किताब अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित या अंग्रेजी में अनुवादित हो. इतना ही नही बल्कि बुकर अवॉर्ड की पारंपरिक शर्तें इस नए संस्करण पर भी लागू होंगी. ऐसे में फाउंडेशन का कहना है कि इस पहल का मकसद बच्चों में अच्छी किताबों के प्रति रुचि बढ़ाना और उनके साहित्यिक टैलेंट को सम्मान देना है.

2027 में मिलेगा पहला अवॉर्ड

इस अवॉर्ड को लेकर फाउंडेशन का कहना है कि चिल्ड्रन्स बुकर प्राइज 2026 की शुरुआत में एंट्री के लिए खुलेगा. इसके साथ ही किताबों की समीक्षा और चयन की प्रक्रिया लगभग एक साल चलेगी और इसके बाद पहला अवॉर्ड 2027 में दिया जाएगा. बता दें कि किताबी दुनिया में बच्‍चों के लिए यह कदम प्रेरणादायक होगा और प्रकाशकों के साथ लेखकों के लिए भी नए अवसर खोलेगा ताकि वे इस आयु वर्ग के लिए और बेहतर साहित्य तैयार करें.

1969 से शुरू हुई बुकर परंपरा

जानकारी देते हुए बता दें कि बुकर प्राइज की स्थापना 1969 में हुई थी. यह पुरस्कार आज दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान माना जाता है. ऐसे में बुकर प्राइज उन लेखकों को दिया जाता है जिन्होंने अंग्रेजी या अनुवादित अंग्रेजी में असाधारण फिक्शन लिखा हो. प्राप्‍त जानकारी के मुताबिक, अभी तक सलमान रुश्दी, मार्गरेट एटवुड, इयान मैकएवन, अरुंधति रॉय और हिलारी मंटेल जैसे दिग्गज इस सम्मान को जीत चुके हैं. बता दें कि भारत के लिए भी बुकर अवॉर्ड का गहरा नाता रहा है और युवा लेखकों के लिए भी एक बड़ा मौका साबित हो सकता है.

भारतीय लेखिका को मिला यह बुकर अवॉर्ड

इस दौरान बुकर प्राइज की बात हो और भारत का जिक्र न आए, ऐसा तो हो ही नही सकता. बता दें कि इस साल भारतीय लेखिका, वकील और एक्टिविस्ट बानू मुश्ताक ने अपनी किताब ‘हार्ट लैंप’ के लिए इंटरनेशनल बुकर प्राइज जीता है. ये भी बता दें कि ‘हार्ट लैंप’ कन्नड़ भाषा में लिखी गई पहली किताब है, जिसे बुकर प्राइज मिला है. इसके साथ ही इस किताब को दीपा भष्ठी ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है और वे इस सम्मान को पाने वाली पहली भारतीय ट्रांसलेटर बनी हैं.

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