तसलीमा नसरीन बोलीं- ‘मदरसे की कोई आवश्यकता नहीं’, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे हमले की बताई सच्चाई

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New Delhi: बांग्‍लादेश की प्रसिद्ध और निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने कहा है कि मुझे लगता है कि किसी भी मदरसे की कोई आवश्यकता नहीं है. बांग्लादेश के कई मदरसों में अन्य धर्मों और गैर-मुस्लिमों के खिलाफ नफरत सिखाई जाती है. जब स्वतंत्र विचार रखने वालों या अल्पसंख्यकों की हत्या कर दी जाती है, तब भी अपराधियों को सजा दिलाने की कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती.

अल्पसंख्यकों की बदहाली की दास्तान आज भी वही

भारत आई नसरीन ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे बर्बर हमलों का कच्चा-चिट्ठा खोल दिया. तसलीमा ने सीधे तौर पर कहा कि बांग्लादेश में सत्ता के चेहरे भले बदल गए हों लेकिन अल्पसंख्यकों की बदहाली की दास्तान आज भी वही है. चाहे तारिक रहमान का मौजूदा दौर रहा हो या फिर पहले मोहम्मद यूनुस का शासन, अल्‍पसंख्‍यकों की स्थिति में ज्‍यादा बदलाव नहीं आया है.

मदरसे नफरत की मुख्य वजह

तसलीमा नसरीन ने देश में बढ़ते धार्मिक कट्टरवाद पर हमला बोलते हुए कहा कि बांग्लादेश में बड़ी संख्या में खुल रहे मदरसे इस नफरत की मुख्य वजह हैं. उन्होंने कहा कि देश को नए मंदिरों या मदरसों की नहीं बल्कि आधुनिक शिक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत है. शिक्षा ही लोगों को जागरूक बना सकती है और सभी को शांति से जीने का अधिकार दे सकती है. उपमहाद्वीप में महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की वकालत करते हुए तसलीमा नसरीन ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की पुरजोर मांग की.

बांग्लादेश में समान अधिकार नहीं मिलता

उन्होंने कहा कि मैं पिछले 40 वर्षों से समान नागरिक संहिता के लिए संघर्ष कर रही हूं. इस उपमहाद्वीप को UCC की सख्त जरूरत है. किसी भी महिला को धर्म आधारित पर्सनल लॉ के तहत नहीं चलाया जाना चाहिए. उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में धार्मिक कानूनों के कारण बेटियों को पिता की संपत्ति में समान अधिकार नहीं मिलता. हिंदू पुरुषों द्वारा एक से ज्‍यादा शादी करने पर महिलाओं को तलाक का अधिकार नहीं मिलता. जो धर्म महिलाओं को सेक्‍चूअल स्‍लेव बनाकर रखता है, उसे पीछे छोड़ देना चाहिए.

अपने व्यक्तिगत दर्द को साझा

तसलीमा नसरीन ने अपने व्यक्तिगत दर्द को साझा करते हुए कहा कि केवल धर्म और कट्टरपंथ की आलोचना करने की वजह से उन्हें अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उनके खिलाफ फतवे जारी किए गए और मौत की सजा घोषित की गई. हालांकि, इन तमाम मुश्किलों और निर्वासन के बावजूद उन्होंने उम्मीद नहीं खोई है और महिलाओं व अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाना जारी रखा.

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