‘एक भूखे व्यक्ति या जिसे बुनियादी मानवीय गरिमा से वंचित रखा गया है, उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता एक खोखला शब्द है’. बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस महमूदाली करीम छागला की ये पंक्तियां मूलभूत सत्य को रेखांकित करती हैं जो आज भी हमारे न्यायशास्त्र की रीढ़ है. 18 सितंबर 2026 को मुंबई विश्वविद्यालय के विधि विभाग द्वारा आयोजित 9वें एम.सी. छागला मेमोरियल लेक्चर में यही विचार पूरे व्याख्यान का केंद्र बिंदु बना रहा.
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने मानवाधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन को लेकर एक बेहद गंभीर और दूरगामी संदेश दिया है. उन्होंने कहा कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति के पास भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और गरिमापूर्ण जीवन की बुनियादी शर्तें नहीं होंगी, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता.
जस्टिस एम.सी. छागला: एक अडिग संवैधानिक प्रहरी
बता दें कि जस्टिस छागला का जीवन भारत के न्यायिक और संवैधानिक इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है. सेंट जेवियर्स स्कूल, बॉम्बे से अपनी शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध लिंकन कॉलेज से कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त की और 1922 में बार में शामिल हुए. लगभग 19 वर्षों तक बॉम्बे हाई कोर्ट में निष्पक्ष और प्रखर वकालत करने के बाद वे न्यायपीठ का हिस्सा बने. वे केवल एक उत्कृष्ट जज ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के साथ अध्यापन का कार्य भी किया और 1933 से 1941 तक बॉम्बे बार काउंसिल के मानद सचिव रहे.
ज्ञात रहे 1947 में आजादी के ऐतिहासिक मोड़ पर वे बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश बने. तात्कालिक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस कनिया द्वारा उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज बनने का न्योता दिया गया था, लेकिन उन्होंने अधिक वेतन, पद और सुविधाओं वाले इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया ताकि वे बॉम्बे हाई कोर्ट में रहकर न्याय की निस्वार्थ सेवा कर सकें.
सेवानिवृत्ति के बाद वे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में जज बने, अमेरिका, ब्रिटेन, मैक्सिको और क्यूबा में भारत के राजदूत व उच्चायुक्त रहे तथा पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री व इंदिरा गांधी की सरकारों में शिक्षा तथा विदेश मंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हालांकि, उनकी असली पहचान उनके पद नहीं, बल्कि उनके अडिग संवैधानिक मूल्य थे. दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के खिलाफ हो रहे भेदभाव का विरोध करना हो या 1975 के आपातकाल के दौरान सत्ता के केंद्रीकरण का पुरजोर विरोध करना, छागला हमेशा नागरिक स्वतंत्रताओं के पक्ष में चट्टान की तरह खड़े रहे.
आंबेडकर और छागला का समान दृष्टिकोण
व्याख्यान में इस बात पर गहरा जोर दिया गया कि केवल वोट देने का अधिकार या भाषण की आजादी होना ही ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ नहीं है. जस्टिस छागला के विचारों की तुलना डॉ. बी.आर. आंबेडकर के उस ऐतिहासिक वक्तव्य से की गई, जिसमें उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र कभी सफल नहीं हो सकता. आंबेडकर के शब्दों में, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र ही राजनीतिक लोकतंत्र का असली ‘मांस और मज्जा’ है. द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर और 1948 में सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पत्र (UDHR) अपनाया गया, तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी इस सत्य को स्वीकार किया.
UDHR ने न केवल बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे नागरिक व राजनीतिक अधिकारों की वकालत की, बल्कि काम करने, शिक्षा पाने और सम्मानजनक जीवन स्तर जैसे सामाजिक व आर्थिक अधिकारों को भी अनिवार्य मानवाधिकार माना. आगे चलकर 1966 के दो अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं (ICCPR और ICESCR) ने यह सिद्ध कर दिया कि ये दोनों अधिकार अलग-अलग नहीं, बल्कि इंसान की गरिमा को बनाए रखने के दो पूरक पहलू हैं.
स्टॉकहोम सम्मेलन से SDGs तक: सतत विकास की वैश्विक यात्रा
व्याख्यान का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित था कि विकास का वास्तविक स्वरूप कैसा होना चाहिए और पर्यावरण के बिना मानवाधिकारों की कल्पना कैसे अधूरी है. 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के साथ वैश्विक स्तर पर पहली बार यह माना गया कि मानव कल्याण और पर्यावरण संरक्षण सीधे तौर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं. इसके बाद 1987 की ब्रंड्टलैंड रिपोर्ट (‘Our Common Future’) ने ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) की अवधारणा को जन्म दिया, जिसका अर्थ था ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करे बिना आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों से समझौता किए. 1992 के रियो अर्थ समिट में पर्यावरण सुरक्षा को विकास प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया, जिसे 2000 के मिललेनियम डेवलपमेंट गोल्स (MDGs) ने आगे बढ़ाया.
आखिरकार 2015 में संयुक्त राष्ट्र ने 2030 एजेंडा के तहत 17 Sustainable Development Goals (SDGs) और 169 लक्ष्यों को अपनाया, जिसका मुख्य दर्शन है “Leave No One Behind” यानी कोई भी व्यक्ति विकास की दौड़ में पीछे न छूटे. सतत विकास मुख्य रूप से दो प्रकार के न्याय की मांग करता है: पहला, ‘इंट्रा-जेनरेशनल इक्विटी’ यानी आज की पीढ़ी के भीतर ही अमीरों और गरीबों के बीच संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा, और दूसरा, ‘इंटर-जेनरेशनल इक्विटी’ यानी आज के विकास के नाम पर भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरण को तबाह न करना.
केवल GDP नहीं, मानव क्षमता है असली पैमाना
व्याख्यान में केवल आर्थिक संकेतकों जैसे GDP या प्रति व्यक्ति आय को विकास का एकमात्र पैमाना मानने की सोच की कड़ी आलोचना की गई. इस दार्शनिक पक्ष को तीन महान विचारकों के सिद्धांतों से समझाया गया. जॉन रॉल्स ने अपनी पुस्तक A Theory of Justice में ‘Justice as Fairness’ का सिद्धांत दिया, जिसका तर्क है कि पूरे समाज के कुल आर्थिक लाभ या GDP वृद्धि के नाम पर समाज के सबसे कमजोर या वंचित वर्ग पर नुकसान नहीं थोपा जा सकता.
वहीं भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी पुस्तक Development as Freedom में कहा कि विकास का अर्थ केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और दमनकारी नीतियों जैसी ‘अस्वतंत्रताओं’ (unfreedoms) को मिटाना है ताकि इंसान अपनी क्षमताओं का खुलकर विस्तार कर सके. इसके साथ ही मार्था नुसबाम के ‘कैपेबिलिटीज एप्रोच’ का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया गया कि असली विकास वह है जो किसी व्यक्ति को शारीरिक स्वास्थ्य, विचार करने की आजादी, सामाजिक भागीदारी और गरिमापूर्ण जीवन जीने के वास्तविक अवसर और क्षमताएं प्रदान करे.
भारतीय संविधान का त्रिकोण: मौलिक अधिकार, नीति-निर्देशक तत्व व कर्तव्य
भारतीय संविधान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर SDGs के आने से कई दशक पहले ही इन सिद्धांतों को अपने ढांचे में पिरो लिया था. संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी दी गई है, जबकि मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21) नागरिक स्वतंत्रताओं और समानता की सुरक्षा करते हैं. इसके साथ ही नीति-निर्देशक तत्व (DPSPs) के तहत अनुच्छेद 38 (लोक कल्याण), 39 (संसाधनों का वितरण), 39A (मुफ्त कानूनी सहायता), 46 (कमजोर वर्गों का संरक्षण) और 47 (सार्वजनिक स्वास्थ्य) एक कल्याणकारी राज्य का खाका खींचते हैं.
शुरुआत में मौलिक अधिकारों और DPSPs के बीच प्राथमिकताओं को लेकर टकराव रहता था, लेकिन 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया कि मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन ही संविधान का ‘बुनियादी ढांचा’ (Basic Structure) है. आगे चलकर 1976 के 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान में अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण का राज्य का कर्तव्य) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का पर्यावरण के प्रति मौलिक कर्तव्य) को जोड़कर इस संवैधानिक त्रिकोण को और अधिक मजबूत बनाया गया.
जस्टिस एम.सी. छागला: एक अडिग संवैधानिक प्रहरी
जस्टिस छागला का जीवन भारत के न्यायिक और संवैधानिक इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है. सेंट जेवियर्स स्कूल, बॉम्बे से निकलकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के लिंकन कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे 1922 में बार में शामिल हुए. उन्होंने 19 वर्षों तक बॉम्बे High Court में वकालत की. छागला केवल एक जज नहीं थे; उन्होंने गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के साथ अध्यापन कार्य भी किया और 1933 से 1941 तक बॉम्बे बार काउंसिल के मानद सचिव रहे. 1947 में आजादी के ऐतिहासिक मोड़ पर वे बॉम्बे High Court के पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश बने.
तात्कालिक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस कनिया द्वारा Supreme Court में जज बनने का न्योता मिलने के बावजूद, छागला ने अधिक वेतन और सुविधाओं वाले उस पद को ठुकरा दिया ताकि वे बॉम्बे High Court की सेवा जारी रख सकें. सेवानिवृत्ति के बाद वे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के जज बने, अमेरिका, ब्रिटेन, मैक्सिको और क्यूबा में भारत के राजदूत/उच्चायुक्त रहे और पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री व इंदिरा गांधी की सरकारों में शिक्षा तथा विदेश मंत्री की भूमिका निभाई. लेकिन उनकी असली पहचान उनके पद नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक मूल्य थे. दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के खिलाफ भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाना हो या 1975 के आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन का मुखर विरोध-छागला हमेशा सत्ता के सामने लोकतंत्र की ढाल बनकर खड़े रहे.

