New Delhi: नॉर्वे की नोबेल समिति ने 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार भारतवंशी नवनीतम नावी पिल्लै को देने का ऐलान किया है. उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के लिए यह सम्मान दिया जाएगा. दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला समेत कई लोगों का कानूनी बचाव किया था. उन्होंने युद्ध अपराध और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने की दिशा में भी अहम काम किया है.
अंतरराष्ट्रीय कानून को व्यापक बनाने में भूमिका
नावी पिल्लै ने अपने लंबे करियर में अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे और प्रभाव को व्यापक बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। रवांडा के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में जज रहते हुए उनके प्रभाव से ही यह अभूतपूर्व कानूनी सिद्धांत स्थापित हुआ कि दुष्कर्म और यौन हिंसा को मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का हिस्सा माना जा सकता है. इसी मामले में उनकी दूरदर्शिता से एक और कानूनी सफलता मिली, जब पहली बार केवल नफरती प्रोपेगैंडा फैलाकर नरसंहार भड़काने के आधार पर किसी आरोपी पर मुकदमा चलाया गया.
हिंसा के कृत्यों को रोकने में कारगर
उन्होंने अपनी निष्पक्षता, विशेषज्ञता और दृढ़ता से यह साबित किया कि कानूनी तंत्र युद्ध और हिंसा के कृत्यों को रोकने में कारगर हो सकते हैं. वे हमारे समय की सबसे सम्मानित अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों में से एक हैं. अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को बढ़ावा देने के उनके असाधारण प्रयासों के लिए उन्हें वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया है. उनका जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक गरीब परिवार में हुआ था.
पहली गैर-श्वेत महिला न्यायाधीश थीं
वह भारतीय तमिल मूल की हैं, जिनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे. वह 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं. इसके अलावा उन्होंने रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (आईसीटीआर) की अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) की न्यायाधीश के रूप में भी सेवा दी है. वह दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में नियुक्त होने वाली पहली गैर-श्वेत महिला न्यायाधीश थीं. वह प्रतिष्ठित हार्वर्ड लॉ स्कूल से कानून में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक भी हैं.
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