Blackboard Chalk Making Process: स्कूल की जिंदगी में कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर बचपन की यादें अपने आप ताजा हो जाती हैं. ब्लैकबोर्ड और शिक्षक के हाथ में मौजूद चॉक भी उन्हीं चीजों में शामिल है. बोर्ड पर चॉक की पहली लकीर पड़ते ही समझ आ जाता था कि पढ़ाई शुरू हो गई है. लेकिन जिस चॉक को हम इतने सालों से बेहद सामान्य चीज समझते आए हैं, उसे तैयार करने के पीछे एक पूरी निर्माण प्रक्रिया होती है. आइए जानते हैं कि पाउडर जैसे कच्चे पदार्थ से यह छोटी-सी चॉक किस तरह तैयार होकर हमारे हाथों तक पहुंचती है…
चॉक के लिए किन पदार्थों की जरूरत होती है?
ब्लैकबोर्ड पर इस्तेमाल होने वाली चॉक मुख्य रूप से खनिज-आधारित पदार्थों से तैयार की जाती है. इसमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल कैल्शियम कार्बोनेट का किया जाता है. हालांकि, चॉक के कुछ प्रकारों में कैल्शियम सल्फेट भी मौजूद होता है. चॉक में इस्तेमाल होने वाली सामग्री हर जगह एक जैसी नहीं होती. इसका इस्तेमाल किए जाने वाले पदार्थ चॉक के प्रकार और उसे बनाने वाले निर्माता के आधार पर अलग हो सकते हैं.
कच्चे पदार्थ से शुरू होती है पूरी प्रक्रिया
चॉक तैयार करने का पहला चरण कच्चे पदार्थ को बारीक रूप में तैयार करना होता है. कैल्शियम कार्बोनेट इस्तेमाल होने की स्थिति में इसे छोटे और महीन कणों वाले पाउडर में बदला जाता है. इसके बाद इस पाउडर में पानी के साथ जरूरत के अनुसार बाइंडिंग सामग्री मिलाई जाती है. इस चरण में मिश्रण का अनुपात काफी महत्वपूर्ण होता है. पानी ज्यादा होने पर मिश्रण को आकार देना मुश्किल हो सकता है, जबकि कम नमी होने पर इसके कण आपस में सही तरीके से जुड़ नहीं पाते.
मिश्रण को कैसे मिलता है चॉक का आकार?
मिश्रण तैयार होने के बाद अगला काम उसे चॉक का आकार देना होता है. इसके लिए विशेष मशीन या मोल्ड का इस्तेमाल किया जाता है. मिश्रण को मशीन में डालने के बाद दबाव के जरिए उसे लंबी और पतली सिलेंडर जैसी आकृति दी जाती है. यही वह आकार है, जिसे स्कूलों में इस्तेमाल होने वाली सामान्य चॉक के रूप में हम पहचानते हैं.
आकार मिलने के बाद चॉक को सुखाया जाता है
मशीन से आकार मिलने के बाद चॉक सीधे इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं होती. उसे सुखाने की प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ता है. इस चरण में चॉक से अतिरिक्त नमी कम की जाती है. इसका उद्देश्य उसे पर्याप्त मजबूती देना होता है, ताकि ब्लैकबोर्ड पर लिखते वक्त चॉक आसानी से टूटे नहीं.
अलग-अलग रंगों में भी मिलती है चॉक
ब्लैकबोर्ड की चॉक को सिर्फ सफेद रंग तक सीमित नहीं माना जाता. बाजार में लाल, पीली, हरी और दूसरे रंगों की चॉक भी उपलब्ध होती हैं. रंगीन चॉक तैयार करने के दौरान उसमें उपयुक्त पिगमेंट मिलाए जाते हैं. इन पिगमेंट का चुनाव चॉक के इस्तेमाल और निर्माण मानकों के हिसाब से किया जाता है.
क्या चॉक खाना सुरक्षित होता है?
चॉक का इस्तेमाल लिखने के लिए किया जाता है, खाने के लिए नहीं. स्कूलों में इस्तेमाल होने वाली सामान्य चॉक में ऐसी सामग्री हो सकती है, जिसे खाद्य पदार्थ के तौर पर तैयार नहीं किया जाता. इसलिए बच्चों को चॉक खाने से रोकना जरूरी है. हालांकि, गलती से चॉक का कोई छोटा टुकड़ा मुंह में चला जाना और जानबूझकर चॉक खाना अलग परिस्थितियां हैं. अगर किसी बच्चे ने बड़ी मात्रा में चॉक निगल ली है या उसके बाद कोई असामान्य लक्षण नजर आ रहे हैं, तो चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है.
छोटी दिखने वाली चॉक के पीछे है पूरी निर्माण प्रक्रिया
ब्लैकबोर्ड पर लिखने के बाद कुछ ही पल में मिट जाने वाली चॉक देखने में भले ही बेहद सामान्य लगती हो, लेकिन इसे तैयार करने के लिए कई चरण पूरे किए जाते हैं. कच्चे पदार्थ को महीन पाउडर में बदलने के बाद उसमें पानी और जरूरत के अनुसार बाइंडिंग सामग्री मिलाई जाती है. फिर तैयार मिश्रण को मशीन या मोल्ड की मदद से चॉक का आकार दिया जाता है और अंत में उसे सुखाया जाता है. इन सभी प्रक्रियाओं के बाद तैयार होती है वह छोटी-सी चॉक, जो दशकों से स्कूल की पढ़ाई और बचपन की यादों का हिस्सा बनी हुई है.
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