ईश्वर को पाने का मार्ग है भक्ति: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, विदुर चरित, ध्रुव चरित, प्रहलाद चरित और वामन अवतार की कथा का गान किया गया। विदुर चरित में वर्णन आता है कि श्री विदुर जी महाराज ने श्री गंगा जी के किनारे कुटिया बनाकर सपत्नीक बारह वर्ष तक फलाहार करते हुए ” ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय ” मंत्र का जाप किए। बारह वर्ष तक लगातार कोई ऐसा कर ले तो संत कहते हैं उसे सिद्धि प्राप्त हो जायेगी। 
भक्तिमार्ग में सिद्धि का अर्थ होता है भगवान का दर्शन। विदुर जी महाराज की साधना ऐसी बन गई थी कि भगवान उनके यहां पधारें और उनको दर्शन दें। तब भगवान ने लीला किया, भगवान शान्ति दूत बन करके हस्तिनापुर पधारे, दुर्योधन ने भगवान की कोई बात नहीं माना। दुर्योधन ने भगवान से कहा कि मैंने आपकी बात तो नहीं माना, लेकिन हमारी माता गांधारी महान पतिव्रता है। उन्होंने आपका आगमन सुन करके छप्पन प्रकार का व्यंजन तैयार किया है आप चल करके भोजन कर लें। 
भगवान ने मना कर दिया और भगवान श्री कृष्ण विदुर जी की कुटिया पर पधारे,वहां उन्होंने केले का छिलका खाया और प्रसाद के रूप में बिना नमक की भाजी खाये। कहते हैं रामावतार में भगवान जैसे शबरी मां के यहां तृप्ति हुए और कृष्णावतार में विदुर जी के यहां तृप्त हुए वैसा दूसरी जगह तृप्त नहीं हुए। भगवान व्यास इस कथा के माध्यम से बताते हैं कि भगवान भक्ति से प्रसन्न होते हैं, प्राप्त होते हैं और संतुष्ट होते हैं, वैसा दूसरे किसी भी साधन से तृप्त नहीं होते हैं।
ध्रुव चरित में बताया कि- भजन साधन करते-करते शरीर किसी कारण शरीर छूट गया, लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाई तो अगले जन्म में जहां तक हम कर चुके हैं उसी के आगे बढ़ना होगा। भक्तिमार्ग राजमार्ग है वहां लौटने की कोई व्यवस्था नहीं है। क्रम से बढ़ते-बढ़ते सिद्धि, जीवन की सफलता और ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को भक्तिमार्ग में खूब निश्चिंत होकर भक्ति करना चाहिए।
प्रहलाद चरित में नवधाभक्ति का उपदेश आया है। भक्ति का अर्थ होता है ईश्वर को पाने का मार्ग। नवधाभक्ति ईश्वर को पाने की नव रास्ते हैं। नवमार्ग, जिस किसी भी मार्ग में सुगमता हो भक्ति के उसी मार्ग पर चल पड़े, उसे ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, भगवान की सेवा, पूजा, वंदन, दास्यभाव, सख्यभाव, भगवान की महिमा और अपनी दीनता का वर्णन इसी को नवीं भक्ति आत्म निवेदन कहा गया है। इसमें से कोई एक भक्ति भी अगर बन जाय भगवत प्राप्ति हो जाती है।जिससे नव की नवभक्ति बन गई उसके यहां भगवान स्वयं चलकर पधारते हैं।
यहां तक भक्ति की बात बताया, फिर भक्ति से भगवान की प्राप्ति हो जाए तो राजा बलि की कथा सुनाया। राजा बलि को उनकी भक्ति से भगवान मिले। तब बलि ने अपना सब कुछ भगवान को समर्पित कर दिया। इसके पीछे संकेत यही है कि भगवान मिल जाएँ, तब भक्त का सम्पूर्ण समर्पण होना चाहिए। भगवान राजा बलि के यहां पधारते हैं। राजा बलि ने अपना सर्व समर्पण तो किया ही स्वसमर्पण भी किया। वहीं से एक शब्द आया बलिदान। आज कोई व्यक्ति परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है तो लोग कहते हैं कि परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए बलिदान हो गये।
कल की कथा में सूर्यवंश और भगवान राम की कथा होगी। भगवान परशुराम का अवतार, श्री बलराम जी महाराज का अवतार, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य, नंदोत्सव की कथा होगी। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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