पुष्कर (राजस्थान): परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा कि यदि जीव सच्ची नम्रता और श्रद्धा के साथ भक्ति करता है, तो भक्तवत्सल भगवान स्वयं उसके हो जाते हैं. लेकिन अक्सर देखा जाता है कि जब मनुष्य ईश्वर की कृपा प्राप्त कर लेता है, तब वह असावधान हो जाता है और अभिमान में पड़कर उस दिव्य कृपा को खो देता है.
उन्होंने कहा कि ईश्वर की प्राप्ति के बाद भी भक्ति का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए. जिस साधन, साधना या भक्ति के माध्यम से भगवान की कृपा मिली हो, उसे त्याग देना कृतघ्नता के समान है. इसलिए भक्त को हमेशा अपने जीवन में भक्ति, श्रद्धा और विनम्रता बनाए रखनी चाहिए.
संत दिव्य मोरारी बापू ने बताया कि ईश्वर और जीव के बीच संबंध उसी प्रकार बना रहता है, जैसा संबंध जीव स्वयं स्थापित करता है. यदि भक्त सच्चे मन से प्रभु से जुड़ा रहता है, तो ईश्वर भी उसी प्रकार उसके जीवन में कृपा बनाए रखते हैं.
उन्होंने कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है. यदि ज्ञान जीवन की क्रियाओं और व्यवहार में नहीं उतरता, तो वह केवल शब्दों तक सीमित रह जाता है. जीवन में संयम, अनुशासन और प्रभु-भक्ति के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है.
संत ने यह भी कहा कि मनुष्य को अपने हर कार्य का लक्ष्य प्रभु की प्रसन्नता रखना चाहिए. जब हम भगवान को प्रसन्न करने की भावना से कोई कार्य करते हैं, तो वह कार्य भी भक्ति का ही रूप बन जाता है.
अंत में उन्होंने सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम और गोवर्धनधाम आश्रम की ओर से साधु-संतों की मंगलकामनाएं और आशीर्वाद प्रदान किए.