पुष्कर (राजस्थान): परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने अपने प्रवचन में मानव जीवन, कर्म और धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि स्वर्ग सुख भोगने की भूमि है, जबकि पृथ्वी कर्म करने की भूमि है. मनुष्य पृथ्वी पर रहते हुए अपने कर्मों के आधार पर भविष्य का निर्माण करता है और उन्हीं कर्मों के अनुसार उसे अलग-अलग लोकों में फल प्राप्त होता है.
मोरारी बापू ने बताया कि स्वर्ग में जीवन मुख्य रूप से सुख-प्रधान होता है, इसलिए वहां नया पुण्य अर्जित करने का अवसर नहीं मिलता. स्वर्ग में केवल पहले से संचित पुण्य का भोग किया जाता है. यही कारण है कि स्वर्ग भले ही सुखद स्थान हो, लेकिन वहां नई आध्यात्मिक प्रगति की संभावना नहीं होती.
पृथ्वी पर सत्कर्म से मिलता है वास्तविक पुण्य
उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर मनुष्य को चाहे अनेक कठिनाइयों और पीड़ाओं का सामना करना पड़े, फिर भी यह स्थान सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां नए सत्कर्म करने की पूरी स्वतंत्रता होती है. इसी वजह से देवता भी भारत भूमि में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं, ताकि वे पुण्य अर्जित कर सकें.
धन का सही उपयोग ही वास्तविक समृद्धि
प्रवचन के दौरान मोरारी बापू ने धन के महत्व और उसके उपयोग पर भी चर्चा की. उन्होंने कहा कि यदि धन का कुछ हिस्सा सुख के लिए खर्च हो और शेष भाग प्रभु सेवा और समाज कल्याण में लगाया जाए, तो लक्ष्मी माता प्रसन्न होती हैं.
उन्होंने कहा कि धन का दुरुपयोग मनुष्य के लिए विष के समान है, जबकि उसका सदुपयोग अमृत के समान होता है.
मान-अपमान में संतुलन ही सबसे बड़ा पुण्य
मोरारी बापू ने कहा कि जीवन में मान और अपमान दोनों स्थितियों में मन को शांत रखना सबसे बड़ा पुण्य कार्य है. उन्होंने बताया कि जब मनुष्य परमात्मा की ओर सच्चे मन से बढ़ता है, तो ईश्वर भी उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य अक्सर धन के पीछे भागते-भागते अपने जीवन का संतुलन खो देता है. इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति धर्म, सदाचार और सेवा के मार्ग पर चलते हुए जीवन को सार्थक बनाए.
प्रवचन के अंत में उन्होंने पुष्कर आश्रम और गोवर्धनधाम आश्रम की ओर से सभी हरि भक्तों को शुभ मंगलकामनाएं दीं.