Pitru Paksha 2026: हिंदू धर्म में पितृपक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का विशेष समय माना जाता है. इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे धार्मिक कार्य करते हैं. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि आखिर कुंडली में पितृ दोष कैसे बनता है और इसके क्या संकेत होते हैं? साथ ही, इसे दूर करने के लिए कौन-से उपाय किए जा सकते हैं? ऐसे में चलिए जानते है इन सभी सवालों के बाारे में विस्तार से…
Pitru Paksha
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ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की कुंडली के लग्न भाव और पांचवें भाव में सूर्य मंगल और शनि विराजमान होते हैं, या कुंडली के अष्टम भाव में गुरु और राहु एक साथ आकर बैठते हैं. पितृदोष का निर्माण होता है, तो पितृदोष बनाता हैं. या जब कुंडली में राहु केंद्र में या त्रिकोण में मौजूद होता है. कोई व्यक्ति अपने से बड़ों का अनादर करता है, या फिर उसकी हत्या कर देता है, तो ऐसे व्यक्ति को पितृ दोष लगता है.
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब हमारे पूर्वजों की आत्माएं तृप्त नहीं होती, तो ये आत्माएं पृथ्वी लोक में रहने वाले अपने वंश के लोगों को कष्ट देती हैं. इसी को ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष कहा गया है. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु लोक पर हमारे पूर्वजों की आत्माएं अपने परिवार के सदस्यों को देखती रहती हैं और जो लोग अपने पूर्वजों का अनादर करते हैं. उन्हें कष्ट और श्राप देती हैं, जिसे पितृ दोष माना जाता है.
ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को कुंडली से जुड़ा महत्वपूर्ण योग माना गया है. मान्यता है कि इसके प्रभाव से व्यक्ति को जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. विवाह में देरी या अड़चन, संतान प्राप्ति में बाधा और पारिवारिक तनाव जैसी स्थितियां सामने आ सकती हैं. कई बार संतान के गलत दिशा में जाने की चिंता भी बनी रहती है.
मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पितरों की शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए पीपल के पेड़ पर काले तिल मिश्रित दूध अर्पित करना शुभ माना जाता है. इसके बाद अक्षत और पुष्प चढ़ाकर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें. वहीं, प्रतिदिन संध्याकाल घर की दक्षिण दिशा में दीपक जलाएं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन उपायों से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं कम होने लगती है.

