गया में पितरों का पिंडदान करने वाले को मिलता है मंगल आशीर्वाद: दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, ये सनातन परम्परा है, पितरों के लिये गया में श्राद्ध करने के पूर्व बड़े पूजा पाठ के साथ यात्रा करते हैं। तब गया श्राद्ध की यात्रा पर जाते हैं। गया में पितरों के लिये पिण्डदान करते हैं। पितर भी भगवान के ही स्वरूप माने जाते हैं- ” पितृ रूपी जनार्दनः।” भगवान जनार्दन ही पितरों के रूप में पूजित होते हैं। वस्तुतः सनातन धर्म में जितनी भी पूजा होती है, चाहे वह पितरों की पूजा हो, चाहे किसी भी देवी-देवता की पूजा हो वस्तुतः वह सब पूजा भगवान की ही पूजा है। – “
सर्व देव नमस्कारं केशवं प्रतिगच्छति।” आप किसी भी देवता को प्रणाम करो, पूजा करो, वो प्रणाम और पूजा भगवान का ही है, क्योंकि भगवान ही सबके भीतर अन्तर्यामी रूप से विद्यमान हैं। जड़ चेतन समस्त पदार्थ में अंतर्यामी रूप से भगवान विद्यमान है। पूजा भी, भले ही किसी की पूजा हो, लेकिन वो पूजा भी भगवान की ही पूजा है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने स्वयं कहा- येप्यन्य देवता भक्त्या यजन्ते श्रद्धयान्विता।तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्य विधि पूर्वकं।। जो लोग अन्य देवताओं का भक्ति और भजन करते हैं। ‘तेऽपि मामेव कौन्तेय’ उनका वह सब पूजा-पाठ मुझे ही प्राप्त होता है। यही भगवान की महिमा है। सबके अन्दर परमात्मा का दर्शन करना यही वेदान्त का अन्तिम सिद्धान्त है। पितरों के लिये जो श्राद्ध किया जाता है, वस्तुतः वह भी भगवान की ही आराधना है। भगवान के प्रसन्न होने पर ही सबका कल्याण होना है।
गया में किसी भी समय में जाकर पिण्डदान किया  जा सकता है। “गयायां सर्वकालेषु पिण्डं दद्द्यात प्रयत्नतः।” गया में किसी भी महीने में जाकर पितरों के निमित्त पिण्डदान किया जाय तो पितरों को परम संतुष्टि की प्राप्ति होती है। सुख प्राप्त होता है। गया श्राद्ध की दुर्लभता का वर्णन भी शास्त्रों में किया गया है। “दुर्लभं त्रिषु लोकेषु गयायां पिण्डपातनं।”
तीनो लोक में अगर दुर्लभ कुछ है तो- “गयायां पिण्डपातनं” गया में जा करके अपने पितरों के लिये पिण्ड पातन करके आये, पिण्ड दे करके आये,ये बड़ा  दुर्लभ है। जो मनुष्य गया में जाकर अपने पितरों के लिये पिण्डदान करता है, वह बहुत ही पुण्यात्मा है। उसे पितरों का मंगल आशीर्वाद प्राप्त होता है, उसके वंश की वृद्धि होती है और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।
एक भ्रम लोगों ने बना रखा है कि गया में पिण्डदान करके आने के बाद, पितरों के लिये पिण्डदान श्राद्ध की आवश्यकता नहीं है। लेकिन ऐसी बात नहीं है। गया में पिण्डदान करने के बाद भी अपने घर में समय-समय पर, पितृपक्ष में- पिता की तिथि पर, माता की तिथि पर,श्राद्धपक्ष में पितरों का पिण्डदान और श्राद्धादि कर्म करते रहना चाहिये।
इसका त्याग नहीं करना चाहिये। हम गया में श्रद्धा करके चले आये, हमको अब पितरों के लिये कुछ करने की आवश्यकता नहीं है ये गलत है।श्राद्ध करना है, ये नित्य कर्म है, श्राद्ध का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
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