Budget 2026: सरकार के पास पैसा कहां से आता है और कहां जाता है? बजट का पूरा गणित समझिए

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Budget 2026: बजट 2026 का वक्त अब करीब आ चुका है. टीवी स्टूडियो से लेकर आम चाय की दुकानों तक, हर जगह इसी बात पर चर्चा हो रही है कि इस बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट में क्या बड़े ऐलान करने वाली हैं. मिडिल क्लास जहां टैक्स में राहत की आस लगाए बैठा है,

वहीं किसान और व्यापारी भी अपने-अपने हितों को लेकर उम्मीदें लगाए हुए हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सरकार जिन करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करने की घोषणाएं करती है, वह पैसा आखिर आता कहां से है? और अगर आता है तो जाता कहां है? इस रिपोर्ट में हम आपको बजट के इसी पूरे गणित को आसान भाषा में समझाने जा रहे हैं.

कहां से आता है खजाने में पैसा?

ज्यादातर लोगों को लगता है कि सरकार सिर्फ हमसे लिए गए इनकम टैक्स के भरोसे चलती है, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है, इसके पीछे की हकीकत कुछ और ही है. मान लीजिए अगर सरकार की कमाई एक रुपये है तो इसकी पाई-पाई का हिसाब कुछ ऐसा होगा.

उधारी की सबसे बड़ी भूमिका: यह जानकर आपको हैरानी होगी कि सरकार की आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत टैक्स नहीं, बल्कि उधारी है. कुल राजस्व का करीब 24% हिस्सा सरकार कर्ज और अन्य देनदारियों के जरिए जुटाती है. यानी अपने खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार से पैसा उधार लेना पड़ता है.

इनकम टैक्स और जीएसटी: इसके बाद सरकार की आय में बड़ा योगदान आयकर का होता है, जिससे करीब 22% राजस्व प्राप्त होता है. वहीं आम लोग जब सामान और सेवाएं खरीदते हैं, तो उस पर लगने वाला GST सरकार की कमाई में लगभग 18% का हिस्सा जोड़ता है. इसके अलावा कंपनियों से वसूला जाने वाला कॉरपोरेट टैक्स करीब 17% योगदान देता है.

अन्य छोटे सोर्स: पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी से 5%, कस्टम ड्यूटी से 4% और सरकारी कंपनियों के मुनाफे या फीस (नॉन-टैक्स रेवेन्यू) से करीब 9% कमाई होती है. अपनी संपत्तियां बेचकर सरकार को सबसे कम यानी महज 1% के आसपास मिलता है.

सरकार की जेब से पैसा जाता कहां है?

अब सवाल ये है कि जब खजाना भर जाता है, तो ये सारा खर्च कहां होता है? तो आपको बता दें कि सरकार के खर्च के भी अपने पक्के ठिकाने हैं. सरकार की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा, करीब 30%, राज्यों को उनके टैक्स के हिस्से के रूप में दे दिया जाता है. आखिर देश राज्यों से ही तो बनता है. दूसरा सबसे बड़ा और ‘मजबूर’ खर्च है ब्याज. सरकार ने पुराने जो कर्ज ले रखे हैं, उनका ब्याज चुकाने में ही 20% पैसा चला जाता है. इसे सरकार चाहकर भी टाल नहीं सकती.

इसके अलावा, केंद्र सरकार अपनी विभिन्न योजनाओं पर कुल बजट का करीब 16% खर्च करती है, जबकि राज्यों के साथ मिलकर संचालित योजनाओं पर करीब 8% राशि खर्च होती है. देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए रक्षा बजट में भी लगभग 8% हिस्सा निर्धारित किया जाता है. वहीं गरीबों को दी जाने वाली खाद्य सहायता, भोजन और अन्य सब्सिडी पर करीब 6% खर्च होता है, जबकि सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन पर लगभग 4% रकम खर्च की जाती है.

क्या निकलता है नतीजा ?

सीधी बात यह है कि सरकार एक बड़े परिवार के मुखिया की तरह है. उसे अपनी कमाई देखनी पड़ती है, और जब कमाई कम पड़ती है, तो वह लोन लेती है. टैक्स देना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसी से स्कूल, अस्पताल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का निर्माण होता है. इसलिए जब अगली बार आप बजट देखें, तो यह याद रखें कि यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि आपके और हमारे द्वारा दिए गए पैसों का पूरा हिसाब-किताब है.

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