भारत को FY35 तक करीब 1.5 अरब स्क्वायर फीट प्राइवेट एजुकेशन इन्फ्रा की होगी आवश्यकता: Report

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Education Infrastructure: भारत में निजी शिक्षा क्षेत्र का विस्तार आने वाले वर्षों में रियल एस्टेट बाजार के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है. वित्त वर्ष 2035 तक देश को करीब 1.5 अरब वर्ग फीट अतिरिक्त निजी शिक्षा बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी. इसमें स्कूलों से लेकर कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थानों तक के लिए जगह शामिल है. शुक्रवार को जारी CBRE साउथ एशिया की रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ती युवा आबादी, शिक्षा संस्थानों में दाखिले की संख्या और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग इस विस्तार की प्रमुख वजहें हैं.

निजी स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों से आएगी सबसे ज्यादा मांग

CBRE की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2035 तक अनुमानित अतिरिक्त मांग में निजी K-12 स्कूलों की हिस्सेदारी सबसे अधिक होगी. करीब 0.9 अरब वर्ग फीट अतिरिक्त जगह की जरूरत निजी स्कूलों के लिए पड़ सकती है. वहीं, निजी और गैर-सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए लगभग 0.4 अरब वर्ग फीट अतिरिक्त बुनियादी ढांचे की मांग का अनुमान है. इस बढ़ती जरूरत के पीछे भारत की बड़ी युवा आबादी और स्कूल-कॉलेजों में बढ़ते दाखिले अहम कारक हैं. इसके अलावा, शिक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ने और बेहतर सुविधाओं वाले संस्थानों की मांग से भी नए प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा मिल सकता है.

रियल एस्टेट डेवलपर्स और निवेशकों के लिए नए अवसर

रिपोर्ट में बताया गया है कि शिक्षा क्षेत्र में बढ़ती मांग से रियल एस्टेट डेवलपर्स और संस्थागत निवेशकों के लिए नए अवसर बन सकते हैं. खासकर बड़े शहरी बाजारों में प्रीमियम K-12 स्कूलों का विस्तार निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ा रहा है. संस्थागत निवेशक ऐसे शिक्षा प्लेटफॉर्म में निवेश की संभावनाएं तलाश रहे हैं, जो अलग-अलग शहरों में बड़े स्तर पर अपने संस्थानों का विस्तार कर सकें. इससे स्कूलों और कॉलेजों के लिए आधुनिक इमारतों, कैंपस और अन्य सुविधाओं के विकास को गति मिल सकती है.

ऑपरेटिंग कंपनी और प्रॉपर्टी कंपनी मॉडल पर जोर

CBRE की रिपोर्ट में एक ऐसे कारोबारी मॉडल का भी जिक्र किया गया है, जिसमें शैक्षणिक संस्थान चलाने वाली कंपनी और संपत्ति की मालिक कंपनी अलग-अलग होती हैं. इसे ऑपरेटिंग कंपनी-प्रॉपर्टी कंपनी मॉडल कहा जाता है. इस व्यवस्था में रियल एस्टेट डेवलपर या संपत्ति मालिक शैक्षणिक संस्थान को जगह लीज पर दे सकते हैं या रेवेन्यू-शेयरिंग के आधार पर कमाई कर सकते हैं. वहीं, शिक्षा संचालक अपना ध्यान पढ़ाई और संस्थान के संचालन पर केंद्रित कर सकते हैं. इस तरह की साझेदारी से शिक्षा क्षेत्र में निवेश और बुनियादी ढांचे का विस्तार आसान हो सकता है.

टियर-II शहरों में भी बढ़ रही निवेशकों की दिलचस्पी

भारत में निजी शिक्षा का विस्तार अब केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रह गया है. दिल्ली-NCR, मुंबई, बेंगलुरु और अन्य बड़े शहरों में पहले से ही संगठित स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों का नेटवर्क मौजूद है. अब टियर-II शहर भी निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं. इन शहरों में बढ़ती छात्र आबादी और शिक्षा संस्थानों की विस्तार योजनाएं नए कैंपस और आधुनिक शैक्षणिक सुविधाओं की मांग पैदा कर रही हैं. ऐसे बाजारों में निवेश की संभावनाएं तलाशने वाले डेवलपर्स के लिए लोकेशन और स्थानीय जरूरतों को समझना महत्वपूर्ण होगा.

CBRE के अधिकारियों ने क्या कहा?

CBRE के भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका के चेयरमैन एवं CEO अंशुमन मैगजीन के मुताबिक, निजी शिक्षा प्रदाता अलग-अलग बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं. ऐसे में विस्तार योग्य बुनियादी ढांचा और मजबूत ऑपरेटिंग मॉडल लंबे समय की वृद्धि में मदद कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि इस मांग को पूरा करने में रियल एस्टेट डेवलपर्स और स्थापित शिक्षा संचालकों के बीच साझेदारी अहम भूमिका निभा सकती है. वहीं, CBRE के भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका के कंसल्टिंग एंड वैल्युएशन सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर रामी कौशल ने कहा कि स्थापित शिक्षा केंद्रों और बड़ी छात्र आबादी वाले उभरते शहरों में विस्तार की अच्छी संभावनाएं हैं. हालांकि, किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता उसकी लोकेशन, उपयुक्त बुनियादी ढांचे और भरोसेमंद शिक्षा संचालकों के साथ साझेदारी पर निर्भर करेगी.

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