El Nino Impact on Food: अल-नीनो बढ़ाएगा महंगाई, दूध, दाल, सब्जी और खाने का तेल हो सकता है महंगा

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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El Nino Impact on Food: जुलाई का महीना शुरू हो चुका है, लेकिन मानसून की रफ्तार अब तक उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है. देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से काफी कम दर्ज की गई है, जिससे खेती, जल स्रोत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में भी बारिश की स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है.

कम बारिश का मतलब सिर्फ खेतों में सूखा पड़ना नहीं होता, बल्कि इसका असर धीरे-धीरे रसोई तक भी पहुंचता है. दूध, दाल, सब्जियां, खाने का तेल और पोल्ट्री उत्पाद जैसी रोजमर्रा की कई जरूरी चीजें महंगी हो सकती हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह प्रशांत महासागर में बन रही अल-नीनो (El Nino) की स्थिति को माना जा रहा है, जो भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले सबसे अहम वैश्विक मौसमीय कारकों में से एक है.

जून में 25 वर्षों की सबसे कमजोर बारिश में शामिल रहा मानसून

इस वर्ष जून महीने में देशभर में औसत से करीब 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है. मौसम के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में जून के दौरान इससे कम बारिश केवल 2009 और 2014 में दर्ज की गई थी. मौसम विभाग का अनुमान है कि जुलाई में भी बारिश सामान्य से कम रह सकती है और पूरे महीने के दौरान औसत वर्षा लगभग 94 प्रतिशत रहने की संभावना है. यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो खरीफ फसलों की बुआई और शुरुआती विकास पर इसका असर देखने को मिल सकता है.

आखिर अल-नीनो क्या है और भारत पर इसका असर कैसे पड़ता है?

अल-नीनो प्रशांत महासागर में बनने वाली एक प्राकृतिक समुद्री और वायुमंडलीय स्थिति है, जो दुनिया के कई देशों के मौसम को प्रभावित करती है. सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की तेज व्यापारिक हवाएं गर्म समुद्री जल को पश्चिम की ओर धकेलती हैं, जिससे हिंद महासागर और भारतीय उपमहाद्वीप के आसपास नमी बढ़ती है और मानसून को मजबूती मिलती है. लेकिन अल-नीनो की स्थिति बनने पर यह चक्र कमजोर पड़ जाता है. गर्म पानी का वितरण बदल जाता है और भारतीय मानसून को पर्याप्त नमी नहीं मिल पाती.

इसका परिणाम कम बारिश, लंबे सूखे जैसे हालात और खेती पर बढ़ते दबाव के रूप में सामने आ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार प्रशांत महासागर में एक सुपर अल-नीनो जैसी स्थिति विकसित होने के संकेत मिल रहे हैं, जिसका असर कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर पड़ सकता है.

दूध और डेयरी उत्पाद हो सकते हैं महंगे

कमजोर मानसून का सबसे पहला असर पशुपालन क्षेत्र पर पड़ने की आशंका रहती है. जब बारिश कम होती है तो हरे चारे की उपलब्धता घट जाती है और पशुओं के लिए चारा महंगा होने लगता है. इससे डेयरी किसानों की लागत बढ़ती है और दूध उत्पादन पर दबाव आता है. हाल ही में अमूल, मदर डेयरी और पराग मिल्क फूड्स जैसी प्रमुख कंपनियां मई महीने में दूध की कीमतों में लगभग 2 से 3% की बढ़ोतरी कर चुकी हैं.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि जुलाई में भी प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्यों में बारिश सामान्य से कम रही, तो दूध की कीमतों में 3 से 4% तक और बढ़ोतरी हो सकती है. दूध महंगा होने का असर केवल दूध तक सीमित नहीं रहेगा. दही, पनीर, मक्खन, घी, छाछ और अन्य डेयरी उत्पादों की कीमतों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है.

दालों और खाने के तेल की कीमतों पर भी बढ़ सकता है दबाव

कम बारिश का सबसे ज्यादा असर उन फसलों पर पड़ता है जो मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर रहती हैं. विशेषज्ञों के अनुसार तूर (अरहर) सहित कई प्रमुख दालों के उत्पादन पर इसका असर पड़ सकता है. यदि उत्पादन घटता है तो बाजार में दालों की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है. इसी तरह सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है. यदि घरेलू उत्पादन कम हुआ तो खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है, जिससे खाने के तेल की कीमतों में भी बढ़ोतरी संभव है.

सब्जियों के दाम भी बढ़ सकते हैं

बारिश में थोड़ी सी कमी का असर सबसे तेजी से सब्जियों की कीमतों पर दिखाई देता है. टमाटर, प्याज, हरी सब्जियां और अन्य जल्दी खराब होने वाली फसलों की आपूर्ति में कमी आते ही खुदरा बाजार में इनके दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं. यदि मानसून कमजोर रहा तो सब्जियों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिसका असर सीधे उपभोक्ताओं की रसोई पर पड़ेगा.

अंडा और चिकन भी हो सकते हैं महंगे

कम बारिश का असर पोल्ट्री सेक्टर पर भी पड़ सकता है. जब पशु आहार और पोल्ट्री फीड की लागत बढ़ती है, तो अंडा और चिकन उत्पादन भी महंगा हो जाता है. ऐसे में आने वाले समय में इन उत्पादों की खुदरा कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

क्या चावल और गेहूं की कीमतें भी बढ़ेंगी?

फिलहाल चावल और गेहूं को लेकर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है. भारत सरकार के पास इन दोनों अनाजों का पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध है. इसके अलावा देश के अधिकांश जलाशयों में पानी का स्तर संतोषजनक बताया जा रहा है और सिंचाई सुविधाएं पहले की तुलना में बेहतर हैं. ऐसे में यदि मानसून बहुत लंबे समय तक कमजोर नहीं रहता, तो चावल और गेहूं की कीमतों पर इसका प्रभाव सीमित रहने की संभावना है.

आगे क्या रहेगा सबसे महत्वपूर्ण?

विशेषज्ञों का कहना है कि हर बार अल-नीनो का मतलब यह नहीं होता कि देश में खाद्य महंगाई बहुत अधिक बढ़ जाएगी. आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि जुलाई और अगस्त में मानसून का प्रदर्शन कैसा रहता है और सरकार आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती है.

फिलहाल आने वाले दो महीने देश की कृषि, खाद्य आपूर्ति और रसोई के बजट के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि इसी दौरान होने वाली बारिश तय करेगी कि आने वाले त्योहारी सीजन में खाद्य पदार्थों की कीमतें किस दिशा में जाएंगी.

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