New Delhi: भारत यूरोप के लिए डीजल का एक प्रमुख सप्लायर बनकर उभरा है. ऊर्जा खुफिया कंपनी वोर्टेक्सा की रिपोर्ट के मुताबिक रूस से डीजल की आपूर्ति में भारी कमी और अमेरिका से निर्यात कमजोर होने के बीच भारत ने यह अलग पहचान बना ली है. रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त, 2026 में बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग से यूरोप जाने वाले डीजल कार्गो में करीब 60 प्रतिशत हिस्सा भारतीय रिफाइनरियों का था. इस दौरान करीब 2 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल और गैसऑयल इस मार्ग से यूरोप पहुंचा.
ईंधन जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका
खास बात यह है कि मार्च और अप्रैल में इस समुद्री रास्ते से डीजल की आवाजाही लगभग रुक गई थी. ऐसे समय में भारतीय रिफाइनरियों ने यूरोप की ईंधन जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भारत की मजबूत स्थिति का सबसे बड़ा कारण उसका विशाल रिफाइनिंग नेटवर्क है. भारत के पास करीब 258.1 मिलियन टन सालाना तेल शोधन क्षमता है. इस क्षमता के कारण भारत घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम उत्पाद दूसरे देशों को भी निर्यात कर सकता है.
6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने करीब 6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया. यूरोप में इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है. रूस पर प्रतिबंध, कुछ रिफाइनरियों में उत्पादन संबंधी समस्याएं और वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव के कारण यूरोप को ईंधन के नए स्रोतों की जरूरत पड़ रही है. यूरोप के डीजल बाजार में रूस लंबे समय तक एक बड़ा सप्लायर रहा है, लेकिन अब रूस से होने वाले समुद्री डीजल और गैसऑयल निर्यात में काफी कमी आई है.
पिछले साल की तुलना में काफी कम निर्यात
अगस्त के पहले 25 दिनों में रूस से समुद्री रास्ते के जरिए केवल करीब 1.5 लाख बैरल प्रतिदिन डीजल और गैस ऑयल का निर्यात हुआ. यह पिछले साल की तुलना में काफी कम है. रूस ने 1 सितंबर से डीजल निर्यात पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है लेकिन तुरंत आपूर्ति बढ़ने की संभावना कम बताई जा रही है. इसकी एक बड़ी वजह यूक्रेन के ड्रोन हमले हैं. जुलाई और अगस्त में रूसी रिफाइनरियों पर कई ड्रोन हमले हुए, जिससे वहां तेल उत्पादन और निर्यात प्रभावित हुआ.
भारत में कच्चे तेल की उपलब्धता कम
हालांकि यूरोप में भारत के लिए डीजल निर्यात के अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं. भारत में कच्चे तेल की उपलब्धता कम हुई है. अगस्त में कच्चे तेल और कंडेनसेट की आपूर्ति घटकर करीब 38 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 48 लाख बैरल प्रतिदिन थी. अगर रूस की आपूर्ति लंबे समय तक कम रहती है और यूरोप में डीजल की मांग बनी रहती है, तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए निर्यात के अवसर और बढ़ सकते हैं.
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