India GDP Growth: वैश्विक अस्थिरता और बाहरी दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ती दिख रही है. मॉर्गन स्टेनली की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.2% रहने का अनुमान है, हालांकि यह पहले के 6.5% के अनुमान से कम है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी, आपूर्ति में व्यवधान और वैश्विक अनिश्चितता जैसी चुनौतियां आर्थिक विकास की रफ्तार को प्रभावित कर रही हैं.
कच्चे तेल की कीमतें बनी मुख्य वजह
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रोथ अनुमान में कटौती का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं, जिनके औसतन लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है. ऊर्जा आयात महंगा होने से व्यवसायों की लागत बढ़ रही है, जिससे उत्पादन पर दबाव पड़ रहा है, महंगाई बढ़ रही है और भारतीय रुपए पर भी असर पड़ रहा है.
अल्पकाल में और गिरावट की आशंका
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अल्पकाल में आर्थिक विकास दर में और गिरावट आ सकती है और जून 2026 की तिमाही में यह सालाना आधार पर 5.9 प्रतिशत तक नीचे जा सकती है. इस मंदी का मुख्य कारण औद्योगिक गतिविधियों में सुस्ती, वित्तीय स्थितियों में सख्ती और कंपनियों के लाभ मार्जिन में कमी बताया गया है.
धीरे-धीरे सुधार की उम्मीद
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि आपूर्ति की स्थिति में सुधार और सरकारी सहायता उपायों के प्रभावी होने से आर्थिक गतिविधियों में धीरे-धीरे सुधार आ सकता है. आने वाले समय में नीतिगत कदम ग्रोथ को स्थिर बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
महंगाई पर बढ़ेगा दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर महंगाई पर भी पड़ने की संभावना है. रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में औसत खुदरा महंगाई दर 5.1% रहने का अनुमान है. उच्च इनपुट लागत, रुपए की कमजोरी और खाद्य व अन्य वस्तुओं की कीमतों के कारण मुद्रास्फीति ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है.
तेल 110 डॉलर पार हुआ तो बढ़ेगा संकट
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाती हैं, तो खुदरा ईंधन की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे व्यापक महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और आम लोगों की जेब पर असर बढ़ेगा.
बाहरी स्थिति पर दबाव, चालू खाता घाटा बढ़ेगा
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की बाहरी स्थिति पर भी दबाव बढ़ने की संभावना है. चालू खाता घाटा पहले के लगभग 1% से बढ़कर जीडीपी का 2.5% तक पहुंच सकता है, जिसका मुख्य कारण तेल आयात बिलों में वृद्धि है.
रुपए पर असर, भुगतान संतुलन में घाटा
पूंजी प्रवाह में कमी के चलते भुगतान संतुलन लगातार तीसरे वर्ष घाटे में रहने का अनुमान है, जिससे भारतीय रुपए पर दबाव और बढ़ सकता है. यह स्थिति आर्थिक स्थिरता के लिए एक चुनौती बन सकती है.
सरकार के सामने संतुलन की चुनौती
स्थिति को संभालने के लिए नीति निर्माताओं द्वारा शुरुआती चरण में राजकोषीय उपायों, जैसे कि सब्सिडी और लागत नियंत्रण पर निर्भर रहने की उम्मीद है. इससे राजकोषीय घाटा बढ़कर जीडीपी का लगभग 4.3% तक पहुंच सकता है.
यह भी पढ़े: मछली उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी: 106% उछाल के साथ 197.75 लाख टन तक पहुंचा भारत