India-New Zealand FTA: भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) 20 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हो गया है. इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी. वहीं, भारतीय उपभोक्ताओं को न्यूजीलैंड से आने वाले कीवी और सेब के लिए सस्ता होने का इंतजार करना होगा. समझौते के पहले साल में इन फलों के आयात पर कोई रियायती कोटा नहीं रखा गया है. दूसरे साल से कीवी पर आयात शुल्क पूरी तरह खत्म हो जाएगा, जबकि सेब पर शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत किया जाएगा. हालांकि, इन रियायतों का लाभ तय आयात कोटे और न्यूनतम कीमत जैसी शर्तों के तहत मिलेगा.
पहले साल सस्ते नहीं होंगे कीवी और सेब
भारत-न्यूजीलैंड व्यापार समझौते से उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना नहीं है. विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, समझौते के पहले साल में न्यूजीलैंड से आने वाले सेब और कीवी के लिए कोई रियायती आयात कोटा निर्धारित नहीं किया गया है. ऐसे में पहले साल इन फलों पर नई व्यापार व्यवस्था के तहत शुल्क में राहत नहीं मिलेगी. हालांकि, दूसरे साल से दोनों फलों के आयात शुल्क में बदलाव होगा. इससे आने वाले समय में भारतीय बाजार में न्यूजीलैंड के सेब और कीवी की कीमतों पर असर पड़ सकता है. लेकिन उपभोक्ताओं को वास्तव में कितनी राहत मिलेगी, यह आयात लागत, परिवहन खर्च, बाजार की मांग और कारोबारियों की कीमतों पर भी निर्भर करेगा.
दूसरे साल से कीवी पर खत्म होगा आयात शुल्क
न्यूजीलैंड के लोकप्रिय कीवी फल के आयात पर दूसरे साल से पूरी तरह शुल्क समाप्त करने का प्रावधान किया गया है. इसके लिए चरणबद्ध आयात कोटा निर्धारित किया गया है. समझौते के तहत दूसरे साल 8,000 टन, तीसरे साल 9,750 टन और पांचवें साल तक 13,250 टन कीवी के आयात पर रियायती व्यवस्था का लाभ मिल सकेगा. हालांकि, शुल्क में छूट का लाभ लेने के लिए कीवी की न्यूनतम सीआईएफ कीमत 1.80 डॉलर प्रति किलोग्राम होना जरूरी है. सीआईएफ कीमत में वस्तु की लागत, बीमा और माल ढुलाई का खर्च शामिल होता है. इस शर्त का उद्देश्य आयात को निर्धारित मूल्य और मात्रा के दायरे में रखना है.
न्यूजीलैंड के सेब पर 50% से घटकर 25% होगा शुल्क
भारत में न्यूजीलैंड से आयात होने वाले सेब पर वर्तमान में 50 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है. समझौते के दूसरे साल से इसे घटाकर 25 प्रतिशत करने का प्रावधान है. यानी निर्धारित शर्तों के तहत सेब के आयात शुल्क में 50 प्रतिशत की कमी होगी. इसके तहत दूसरे साल 35,000 टन सेब के आयात पर रियायती शुल्क का लाभ मिल सकेगा. यह कोटा छठे साल तक बढ़ाकर 45,000 टन किया जाएगा. इससे भारतीय बाजार में न्यूजीलैंड के सेब की आयात लागत कम हो सकती है और भविष्य में कीमतों में नरमी आने की संभावना है. हालांकि, आयात शुल्क घटने का मतलब यह नहीं है कि बाजार में सेब की खुदरा कीमत भी उतने ही अनुपात में कम हो जाएगी. वास्तविक कीमत पर अन्य खर्चों और बाजार की परिस्थितियों का भी असर पड़ेगा.
भारतीय किसानों और बागवानों के हितों का भी रखा गया ध्यान
व्यापार समझौते के तहत विदेशी फलों के आयात पर राहत देने के साथ भारतीय किसानों और बागवानों के हितों की सुरक्षा के लिए भी प्रावधान किए गए हैं. न्यूजीलैंड से आयात होने वाले सेब के लिए न्यूनतम सीआईएफ कीमत 1.25 डॉलर प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आयातित सेब बेहद कम कीमत पर भारतीय बाजार में न आएं और घरेलू उत्पादकों को अनुचित प्रतिस्पर्धा का सामना न करना पड़े. भारत में सेब की खेती करने वाले किसानों के लिए यह प्रावधान महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
मानुका शहद और एल्ब्यूमिन को भी मिलेगी व्यापार समझौते में जगह
भारत-न्यूजीलैंड एफटीए का दायरा केवल सेब और कीवी तक सीमित नहीं है. इसमें न्यूजीलैंड के प्रसिद्ध मानुका शहद और प्रोटीन उत्पाद एल्ब्यूमिन को भी शामिल किया गया है. समझौते के प्रावधानों के अनुसार, एल्ब्यूमिन पर 11 प्रतिशत रियायती शुल्क लागू होगा और इसके लिए शुरुआती आयात कोटा 200 टन निर्धारित किया गया है. वहीं, मानुका शहद के लिए पहले साल 40 टन और दूसरे साल से 200 टन का वार्षिक आयात कोटा तय किया गया है. इन प्रावधानों से दोनों देशों के बीच कृषि उत्पादों और अन्य वस्तुओं के व्यापार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
भारतीय निर्यातकों को मिलेगा 100% ड्यूटी-फ्री एक्सेस
भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए इस समझौते का एक अहम पहलू भारतीय निर्यातकों को मिलने वाली बाजार पहुंच है. समझौते के तहत भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी. इससे भारतीय उत्पादों को न्यूजीलैंड में निर्यात करने के अवसर बढ़ सकते हैं और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूती मिल सकती है. वहीं, भारतीय उपभोक्ताओं के लिए कीवी और सेब की कीमतों में संभावित राहत दूसरे साल से शुरू होगी. आयात शुल्क में कटौती, निर्धारित कोटे और न्यूनतम कीमत की शर्तों के तहत इस समझौते का असर धीरे-धीरे बाजार में दिखाई दे सकता है.

