भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात सितंबर 2026 में 13 प्रतिशत घट गया. बढ़ती तेल कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बना हुआ है. सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस से भारत के कच्चे तेल आयात में लगातार दूसरे महीने गिरावट दर्ज की गई और यह अप्रैल 2026 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया.
जामनगर रिफाइनरी में आयात 27% घटा
सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में भारत की प्रमुख रिफाइनरियों में रूसी कच्चे तेल की खरीद में गिरावट देखने को मिली. रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी में रूसी तेल का आयात 27 प्रतिशत घट गया. वहीं, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) की पारादीप रिफाइनरी में आयात 21 प्रतिशत और नायरा एनर्जी की वाडिनार रिफाइनरी में 8 प्रतिशत कम हुआ. रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने लाल सागर के व्यापार मार्ग और होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले ऊर्जा परिवहन को प्रभावित किया. इसके चलते वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और कीमतों में तेजी आई.
रूस का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना भारत
रूसी कच्चे तेल के आयात में गिरावट के बावजूद भारत सितंबर में रूस का दूसरा सबसे बड़ा जीवाश्म ईंधन खरीदार बना रहा. इस दौरान भारत ने रूस से 4.1 अरब यूरो मूल्य के हाइड्रोकार्बन खरीदे. इसमें कच्चे तेल की हिस्सेदारी 88 प्रतिशत रही. रूस से सबसे ज्यादा जीवाश्म ईंधन खरीदने वाला देश चीन बना रहा. सीआरईए के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अब तक रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत रही है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत दर्ज की गई.
ट्रंप के फैसले से भारत और चीन को राहत
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश जारी कर रूसी तेल निर्यात से जुड़े कई प्रतिबंधों और शुल्कों में छूट दी. ये प्रतिबंध अगले दिन से लागू होने वाले थे. ट्रंप ने इस फैसले को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया. इस कदम से भारत और चीन को रूसी तेल का आयात मौजूदा स्तर पर जारी रखने में राहत मिलने की उम्मीद है. हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव संबंधित प्रतिबंधों और छूट की शर्तों पर निर्भर करेगा.
रूसी कच्चे तेल की कीमत 90.7 डॉलर प्रति बैरल पहुंची
सीआरईए की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 में रूस के यूराल ग्रेड कच्चे तेल की औसत कीमत महीने-दर-महीने 32 प्रतिशत बढ़कर 90.7 डॉलर प्रति बैरल हो गई. अप्रैल 2026 के बाद यह इसका सबसे ऊंचा मासिक औसत स्तर रहा. यह कीमत यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की ओर से निर्धारित 44.1 डॉलर प्रति बैरल की मूल्य सीमा से भी दोगुने से अधिक है. रिपोर्ट के मुताबिक, यह मूल्य सीमा 1 फरवरी 2026 से प्रभावी हुई थी और यूरोपीय संघ के 21वें प्रतिबंध पैकेज के तहत इसे बरकरार रखा गया है.
होर्मुज से तेल परिवहन बढ़ा, फिर भी कीमतें ऊंची
रिपोर्ट में कहा गया है कि सितंबर में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल परिवहन में पिछले महीने की तुलना में 60 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई. इसके बावजूद वैश्विक जीवाश्म ईंधन की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं. हालांकि, कीमतें अभी भी अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों से पहले के स्तर से नीचे थीं. सीआरईए के विश्लेषण के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े ऊर्जा संकट ने रूस की निर्यात आय को भी बढ़ावा दिया. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद के छह महीनों में तेल और गैस की ऊंची कीमतों के कारण रूस की समुद्री मार्ग से होने वाली जीवाश्म ईंधन निर्यात आय में लगभग 35.9 अरब डॉलर यानी करीब 31 अरब यूरो की अतिरिक्त वृद्धि हुई.
कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भर है रूस का ऊर्जा निर्यात
रिपोर्ट के अनुसार, रूस का जीवाश्म ईंधन निर्यात अब भी कुछ प्रमुख खरीदारों पर काफी हद तक निर्भर है. चीन रूसी कच्चे तेल और कोयले का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है. वहीं, तुर्किये रूसी तेल उत्पादों का प्रमुख खरीदार है, जबकि यूरोपीय संघ रूस से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और पाइपलाइन गैस का सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है. इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी तनाव के बीच रूस की निर्यात आय को ऊंची कीमतों से फायदा मिल रहा है, जबकि भारत में रूसी कच्चे तेल की खरीद में लगातार दूसरे महीने गिरावट दर्ज की गई है.

