Gurmeet Ram Rahim: राम रहीम को बड़ी राहत, पत्रकार हत्याकांड में हाईकोर्ट ने किया बरी

Ved Prakash Sharma
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Gurmeet Ram Rahim: डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को लेकर बड़ी खबर सामने आई है. यहां पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शनिवार को गुरमीत राम रहीम को बड़ी राहत दी है. पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में राम रहीम को हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है. मालूम हो कि पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या वर्ष 2002 में हुई थी, जिसका आरोप गुरमीत राम रहीम पर भी था. हालांकि, अदालत ने मामले में दोषी ठहराए गए अन्य तीन आरोपियों कुलदीप, निर्मल और किशन लाल की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है.

मालूम हो कि हाई कोर्ट का यह फैसला सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख को दोषी ठहराए जाने और आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के सात साल से अधिक समय बाद आया है. राम रहीम के अधिवक्ता जितेंद्र खुराना के मुताबिक, होई कोर्ट ने पहले के फैसले को पलटते हुए उन्हें पत्रकार की हत्या से संबंधित आरोपों से मुक्त कर दिया है.

सीबीआई कर रही थी मामले की जांच

यह मामला पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या से जुड़ा हुआ है, जिसने अपने समय में काफी सुर्खियां बटोरी थीं. छत्रपति ने अपने अखबार में डेरा से जुड़े कुछ गंभीर आरोपों को प्रकाशित किया था, जिसके बाद वर्ष 2002 में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी. इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी और मामले की जांच बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई थी.

सीबीआई की विशेष अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद मामले में डेरा मुखी सहित अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस फैसले के खिलाफ सभी दोषियों ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में अपील दाखिल की थी.

नाकाफी रहे प्रस्तुत साक्ष्य

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और सीबीआई की ओर से विस्तृत बहस की गई. अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और परिस्थितिजन्य तथ्यों का विश्लेषण करने के बाद अपना फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि डेरा मुखी के खिलाफ अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य इतने मजबूत नहीं हैं कि उनके खिलाफ आपराधिक साजिश में संलिप्तता को संदेह से परे साबित किया जा सके.

वहीं, कुलदीप, निर्मल और किशन लाल के खिलाफ अदालत ने पाया कि उनके विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्य और गवाहियों से उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित होती है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखने का आदेश दिया.

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