Pregnancy High BP: गर्भावस्था में हाई बीपी को न करें नजरअंदाज, मां और बच्चे की सेहत के लिए समय पर जांच जरूरी

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Pregnancy High BP: गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं. इस समय मां की सेहत का असर गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर भी पड़ता है. ऐसे में ब्लड प्रेशर का बढ़ना एक ऐसी समस्या है, जिसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. हाई ब्लड प्रेशर से गर्भवती महिला के साथ-साथ बच्चे की सेहत पर भी गंभीर असर पड़ सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से जुड़ी समस्याएं दुनियाभर में मातृ मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं की प्रमुख वजहों में शामिल हैं. खासतौर पर प्री-एक्लेम्पसिया जैसी स्थिति समय पर पहचान में न आए, तो यह जानलेवा हो सकती है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि गर्भावस्था में हाई बीपी क्यों खतरनाक है, इसके कौन-से लक्षण दिखाई देते हैं और समय पर जांच क्यों जरूरी है.

गर्भावस्था में हाई बीपी कितना खतरनाक है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनियाभर में लगभग 10 से 15 प्रतिशत गर्भधारण में हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं. इनमें प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर स्थिति भी शामिल है. गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से जुड़े विकारों के कारण हर साल दुनियाभर में लगभग 42 हजार महिलाओं की मौत होने का अनुमान है. इसके अलावा, इन समस्याओं से पांच लाख से अधिक मृत-जन्म और नवजात शिशुओं की मौत के मामले भी जुड़े हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कितनी महत्वपूर्ण है. समय रहते हाई बीपी का पता चलने पर डॉक्टर उचित इलाज और निगरानी के जरिए गंभीर जटिलताओं के खतरे को कम करने में मदद कर सकते हैं. इसलिए गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

क्या है प्री-एक्लेम्पसिया, जो मां और बच्चे के लिए बन सकता है खतरा?

प्री-एक्लेम्पसिया गर्भावस्था से जुड़ी एक गंभीर स्थिति है, जिसमें आमतौर पर गर्भावस्था के 20 सप्ताह बाद हाई ब्लड प्रेशर विकसित होता है. इसके साथ किडनी, लिवर और शरीर के अन्य अंगों पर असर पड़ने के संकेत भी मिल सकते हैं. कई मामलों में यूरिन में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है, हालांकि इसका न होना भी प्री-एक्लेम्पसिया की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता. अगर समय पर इस समस्या की पहचान और इलाज न हो, तो गर्भवती महिला को गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है. इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ सकता है. कुछ मामलों में बच्चे का विकास प्रभावित हो सकता है या समय से पहले प्रसव की जरूरत पड़ सकती है. गंभीर स्थिति में मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है.

हाई बीपी के इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर या प्री-एक्लेम्पसिया के कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कई बार शुरुआत में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिलता. इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर इस समस्या का पता लगाना संभव नहीं है.

इन लक्षणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:

  • तेज या लगातार सिरदर्द होना.
  • आंखों के सामने धुंधलापन आना या चमक दिखाई देना.
  • पेट के ऊपरी हिस्से में, खासकर पसलियों के नीचे दर्द होना.
  • चेहरे और हाथों में अचानक सूजन आना.
  • सांस लेने में परेशानी होना.
  • अचानक तबीयत बिगड़ना या असामान्य रूप से अस्वस्थ महसूस करना.

इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. खासतौर पर तेज सिरदर्द, नजर में बदलाव, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द या सांस लेने में परेशानी होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है. नियमित जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना लक्षणों के भी ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ हो सकता है.

WHO ने हाई बीपी से होने वाली जटिलताओं को रोकने के लिए बनाई रणनीति

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर से होने वाली मौतों और गंभीर जटिलताओं को रोकने के लिए 2026 से 2035 और उसके बाद तक की वैश्विक रणनीति पेश की है. इसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच और इलाज उपलब्ध कराना है. इस रणनीति में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, जरूरी दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मदद से बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने और आपातकालीन परिस्थितियों में समय पर इलाज उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है. इसका मकसद गर्भावस्था से जुड़ी उच्च रक्तचाप की समस्याओं की समय रहते पहचान करना और उनसे होने वाले गंभीर परिणामों को कम करना है.

गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने के लिए क्या करें?

गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच सबसे जरूरी कदमों में से एक है. डॉक्टर आमतौर पर हर जांच के दौरान ब्लड प्रेशर मापते हैं. जरूरत पड़ने पर यूरिन में प्रोटीन की जांच और अन्य टेस्ट भी कराए जा सकते हैं. रिपोर्ट और महिला की स्थिति के आधार पर आगे के इलाज का फैसला लिया जाता है. अगर ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ पाया जाता है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं लेना और नियमित निगरानी कराना जरूरी है. गर्भावस्था में बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए.

पहले से हाई बीपी की समस्या होने पर गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था की शुरुआत में ही डॉक्टर को इसकी जानकारी देना भी महत्वपूर्ण है. इसके अलावा, संतुलित आहार लेना, पर्याप्त आराम करना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार शारीरिक गतिविधियां जारी रखना सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है. हालांकि, केवल खानपान या घरेलू उपायों के भरोसे हाई ब्लड प्रेशर का इलाज नहीं करना चाहिए.

डिलीवरी के बाद भी बना रह सकता है हाई बीपी का खतरा

गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर की समस्या का असर बच्चे के जन्म के बाद भी बना रह सकता है. जिन महिलाओं को गर्भावस्था में हाई बीपी या प्री-एक्लेम्पसिया हुआ हो, उनमें आगे चलकर उच्च रक्तचाप, दिल की बीमारी, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए डिलीवरी के बाद भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना चाहिए.

अगर प्रसव के बाद तेज सिरदर्द, नजर में बदलाव, सांस लेने में परेशानी या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए. नियमित फॉलो-अप से भविष्य में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान करने और समय पर इलाज शुरू करने में मदद मिल सकती है.

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