Social Media Addiction: आज के दौर में मोबाइल फोन लोगों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. पढ़ाई से लेकर मनोरंजन और बातचीत तक लगभग हर काम अब मोबाइल के जरिए होने लगा है. लेकिन सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब कम उम्र के बच्चे और किशोर घंटों फोन में डूबे रहने लगते हैं. कई माता-पिता की शिकायत होती है कि उनका बच्चा मोबाइल छोड़ने को तैयार ही नहीं होता. घंटों तक लगातार वीडियो देखना, बिना रुके स्क्रॉल करना और बार-बार सोशल मीडिया खोलना अब आम बात बन चुकी है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चे आखिर फोन से इतने ज्यादा जुड़े क्यों रहते हैं? यह केवल आदत नहीं, बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों की एक खास रणनीति का हिस्सा भी है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन मंचों को इस तरह तैयार किया जाता है कि लोग ज्यादा से ज्यादा समय तक स्क्रीन पर बने रहें और बच्चे इसकी गिरफ्त में सबसे जल्दी आते हैं.
सोशल मीडिया कैसे बच्चों को बांधे रखता है?
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यानी यूनिसेफ ने डिजिटल पेरेंटिंग विशेषज्ञ डॉ. जैकलीन नेसी के हवाले से बताया है कि सोशल मीडिया मंचों में कई ऐसे फीचर जानबूझकर डाले जाते हैं जो बच्चों को लंबे समय तक मोबाइल पर रोके रखते हैं. इनमें सबसे बड़ा तरीका है “इनफिनिट स्क्रॉल”, यानी ऐसी फीड जो कभी खत्म नहीं होती. बच्चा जितना नीचे जाता है, उतना नया कंटेंट सामने आता रहता है. इसके अलावा वीडियो का अपने आप चलना, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, लाइक्स, व्यूज और स्ट्रीक्स जैसे फीचर बच्चों को बार-बार ऐप खोलने के लिए मजबूर करते हैं. इसी वजह से बच्चों को समय का अंदाजा ही नहीं लगता और वे घंटों मोबाइल में लगे रहते हैं.
एल्गोरिदम कैसे करता है काम?
विशेषज्ञों के मुताबिक सोशल मीडिया का एल्गोरिदम बेहद चालाक तरीके से काम करता है. यह लगातार यह देखता रहता है कि बच्चा किस तरह के वीडियो ज्यादा देर तक देख रहा है, किस पोस्ट पर ज्यादा समय रुक रहा है और किस चीज में उसकी ज्यादा रुचि है. इसके बाद उसी तरह का और ज्यादा कंटेंट बच्चे के सामने दिखाया जाता है ताकि वह ज्यादा समय तक मंच पर बना रहे. इसका मुख्य मकसद लोगों की भागीदारी बढ़ाना होता है, न कि बच्चों की भलाई.
बच्चे जल्दी क्यों हो जाते हैं प्रभावित?
डॉ. जैकलीन नेसी के मुताबिक बच्चों और किशोरों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता. उनमें खुद पर नियंत्रण रखने की क्षमता बड़ों की तुलना में कम होती है. यही वजह है कि वे लाइक्स, कमेंट्स और सोशल रिवार्ड्स जैसी चीजों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. अगर उनके दोस्त किसी सोशल मीडिया मंच पर लगातार सक्रिय हैं और बच्चा उसमें शामिल नहीं है, तो उसे अकेलापन महसूस होने लगता है. इस डर की वजह से बच्चे बार-बार फोन चेक करते रहते हैं और धीरे-धीरे इसकी आदत गहरी होती जाती है.
मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है असर
एक्सपर्ट बताते हैं कि सोशल मीडिया का असर हर बच्चे पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है. कुछ बच्चे भावनात्मक रूप से ज्यादा संवेदनशील होते हैं, इसलिए उन पर इसका असर ज्यादा गहरा हो सकता है. सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है जब सोशल मीडिया बच्चों की नींद, पढ़ाई, खेलकूद और परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय की जगह लेने लगता है. अगर बच्चा देर रात तक फोन चलाता है, होमवर्क पूरा नहीं कर पा रहा, परिवार से दूरी बना रहा है या स्कूल में ध्यान नहीं दे पा रहा है, तो यह गंभीर चिंता का संकेत हो सकता है.
माता-पिता क्या करें?
डॉ. जैकलीन नेसी माता-पिता को बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करने की सलाह देती हैं. उनका कहना है कि बच्चों को डांटने के बजाय यह समझना जरूरी है कि वे सोशल मीडिया पर इतना समय क्यों बिताते हैं. साथ ही बच्चों को यह भी समझाना चाहिए कि सोशल मीडिया मंच किस तरह लोगों को लंबे समय तक जोड़कर रखने के लिए डिजाइन किए जाते हैं. विशेषज्ञ माता-पिता को स्क्रीन टाइम की सीमा तय करने, परिवार के साथ समय बिताने और खुद भी फोन का संतुलित इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं. उनका मानना है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं.
पूरी तरह बुरा नहीं है सोशल मीडिया
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पूरी तरह से गलत नहीं है. सही मार्गदर्शन और सीमित इस्तेमाल के साथ बच्चे इसका सकारात्मक उपयोग भी कर सकते हैं. लेकिन जरूरी यह है कि माता-पिता बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें और उन्हें संतुलित जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करें.
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