“रात हो गई है, बाहर मत जाओ…”, “अकेले मत निकलो…”, “ऐसे कपड़े मत पहनो…” — ये बातें आज भी देश की करोड़ों लड़कियों और महिलाओं की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं. भले ही समाज आधुनिकता की बात करता हो, लेकिन जब सुरक्षा की बात आती है, तो जिम्मेदारी का पूरा बोझ अब भी महिलाओं के कंधों पर ही डाल दिया जाता है. सवाल साफ है— आखिर हर बार सावधान रहने की हिदायत सिर्फ महिलाओं को ही क्यों दी जाती है? क्या यह वाकई उनकी सुरक्षा के लिए है या समाज की एक गहरी जड़ें जमा चुकी सोच का नतीजा?
‘सॉफ्ट टारगेट’ मानने की मानसिकता
यह तो सच है कि महिलाओं की शारीरिक बनावट पुरुषों की तुलना में काफी अलग और कोमल होती है. यही वजह है कि किसी भी अपराध या अन्य मुश्किलों वाले हालातों में महिलाओं ‘सॉफ्ट टारगेट’ या आसान शिकार मान लिया जाता हैं. आज भी कुछ लोगों का यह सोचना है कि वे पलटकर ज्यादा विरोध नहीं कर पाएंगी. इसी डर से घर-परिवार वाले अक्सर महिलाओं को ज्यादा अलर्ट रहने की सलाह देते हैं.
डराने वाले आंकड़े
महिला सुरक्षा से जुड़े आंकड़े भी इस सोच को और मजबूत करते हैं. छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और हिंसा जैसी घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं. अखबारों और न्यूज में रोज़ दिखने वाली ये घटनाएं परिवारों में डर पैदा करती हैं, और इसका सीधा असर लड़कियों की आजादी पर पड़ता है.
‘विक्टिम ब्लेमिंग’ की समस्या
सबसे बड़ी समस्या है ‘विक्टिम ब्लेमिंग’ यानी घटना के बाद पीड़िता को ही दोष देना. “वह रात में बाहर क्यों गई?”, “उसने ऐसे कपड़े क्यों पहने?” — ऐसे सवाल आज भी आम हैं. अपराधियों को कटघरे में खड़ा करने के बजाय, समाज लड़कियों पर ही नियम थोपना ज्यादा आसान समझता है.
जेंडर-स्पेसिफिक खतरे
सड़क, ऑफिस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट— लगभग हर जगह महिलाओं को स्टॉकिंग, अभद्र टिप्पणियों और यौन हिंसा का खतरा पुरुषों की तुलना में ज्यादा झेलना पड़ता है. यही वजह है कि सुरक्षा से जुड़ी गाइडलाइन्स अक्सर महिलाओं के लिए ही बनाई जाती हैं.
परवरिश में छिपी सोच
हमारी परवरिश में भी यह धारणा गहराई से मौजूद है कि “लड़कियों को सुरक्षा चाहिए.” बचपन से ही लड़कियों को सीमाओं में रहने की सीख दी जाती है, जबकि लड़कों को उतनी रोक-टोक नहीं झेलनी पड़ती. यह असंतुलन आगे चलकर समाज की सोच को और मजबूत करता है.
समाधान क्या है?
समस्या का हल सिर्फ लड़कियों को ‘सावधान’ रहने की सलाह देना नहीं है. असली बदलाव तब आएगा, जब समाज अपनी सोच बदलेगा. बेटियों को सीमित करने के बजाय बेटों को सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी सिखाना ज्यादा जरूरी है. कानून का सख्त पालन, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और समाज में जागरूकता— ये तीनों मिलकर ही ऐसा माहौल बना सकते हैं, जहां महिलाएं बिना डर के अपनी जिंदगी जी सकें.
बदलनी होगी सोच
अब वक्त आ गया है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं पर डालने की परंपरा को खत्म किया जाए. बराबरी की बात तभी सार्थक होगी, जब महिलाएं बिना डर और बिना बेवजह की हिदायतों के अपने फैसले खुद ले सकें. तभी समाज सही मायनों में प्रगतिशील कहलाएगा.

