New Delhi: बिहार के भोजपुर जिले में भरत भूषण तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ में मौत का मामला अब तूल पकडता हुआ नजर आ रहा है. बता दें कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की गई है. इस संबंध में शीर्ष अदालत के समक्ष एक प्रतिनिधित्व (रिप्रेजेंटेशन) दायर कर एफआईआर दर्ज करने, स्वतंत्र जांच कराने और पुलिस मुठभेड़ों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की अपील की गई है.
अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने दायर किया
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को संबोधित यह प्रतिनिधित्व अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने दायर किया है. इसमें 17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुई मुठभेड़ की न्यायालय की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई है. जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या विशेष जांच दल (एसआईटी) से कराने का सुझाव दिया गया है. प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि इस घटना ने कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और पुलिस मुठभेड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
भरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था
याचिका में दावा किया गया है कि मृतक के परिजनों और ग्रामीणों का आरोप है कि भरत भूषण तिवारी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना हथियार भी फेंक दिया था. सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो भी कथित रूप से आत्मसमर्पण की स्थिति की ओर संकेत करते हैं. परिवार का कहना है कि गोली चलाए जाने के समय तिवारी निहत्थे थे और यह वास्तविक मुठभेड़ नहीं बल्कि न्यायेतर हत्या (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग) थी.
एफआईआर की जानकारी उपलब्ध नहीं
प्रतिनिधित्व में यह भी कहा गया है कि मृतक के खिलाफ किसी आपराधिक इतिहास या पूर्व एफआईआर की सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है. उन्हें एक स्नातक और सोशल मीडिया के माध्यम से बाढ़, कटाव तथा जनसमस्याओं को उठाने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता था. याचिका के अनुसार, यदि तिवारी ने वास्तव में आत्मसमर्पण कर दिया था, तो उनके खिलाफ घातक बल का प्रयोग कानून सम्मत पुलिस कार्रवाई की सीमा से बाहर माना जा सकता है और यह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103 के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकता है.
राज्य मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट देना अनिवार्य
प्रतिनिधित्व में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2014 के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी भी पुलिस मुठभेड़ में मौत होने पर एफआईआर दर्ज करना, स्वतंत्र जांच कराना, मजिस्ट्रेट जांच, सबूतों का संरक्षण और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) या राज्य मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट देना अनिवार्य है. याचिका में कहा गया है कि पुलिस मुठभेड़ केवल असाधारण परिस्थितियों में और जीवन पर तत्काल खतरे की स्थिति में ही की जा सकती है. इसे गिरफ्तारी, जांच, मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता.
पुलिसकर्मियों के निलंबन की खबरें
प्रतिनिधित्व में यह भी उल्लेख किया गया है कि मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों के निलंबन की खबरें सामने आई हैं, जिससे घटना की वैधता पर और सवाल उठते हैं. साथ ही, न्याय की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने का भी आरोप लगाया गया है, जिससे गवाहों और प्रभावित लोगों में भय का माहौल बन सकता है. याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि मामले में बीएनएस की धारा 103 सहित अन्य प्रासंगिक धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज कराने, स्थानीय पुलिस से अलग किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने और घटना से जुड़े सभी वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार और फोरेंसिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाएं.
मानवाधिकार आयोग को स्वतंत्र जांच के निर्देश
साथ ही एनएचआरसी और बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग को स्वतंत्र जांच के निर्देश देने तथा मृतक के परिजनों और गवाहों को सुरक्षा प्रदान करने की भी मांग की गई है. भोजपुर एनकाउंटर को लेकर बढ़ते विवाद और राजनीतिक दबाव के बीच बिहार सरकार ने शनिवार को न्यायिक जांच के आदेश दिए थे. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने घोषणा की थी कि हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश इस मामले की स्वतंत्र जांच करेंगे और सभी तथ्यों तथा विवादित पहलुओं की पड़ताल करेंगे.
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