साल 2100 में घर नहीं, हवा और पानी के लिए होगा युद्ध! AI की भविष्यवाणी सुनकर कांप जाएगी रूह

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

AI Prediction 2100: ऊपर से देखने पर धरती आज भी बेहद खूबसूरत नजर आती है, लेकिन भीतर ही भीतर वह एक गंभीर बीमारी से जूझ रही है. ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसे विनाश की ओर बढ़ रही है, जो फिल्मों में दिखाए जाने वाले अचानक खत्म होने वाले अंत जैसा नहीं होगा. यह खतरा कहीं ज़्यादा भयावह होगा, क्योंकि यह धीरे-धीरे आएगा. ऐसा लगेगा कि दुनिया सामान्य रूप से चल रही है, जीवन अपनी रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, लेकिन हकीकत में अंदर से सबकुछ टूटता और बिखरता जाएगा. यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चेतावनी है.

Global Warming Crisis

AI ने अगले 100 वर्षों में धरती की हालत को लेकर जो भविष्यवाणी की है, वह इतनी डरावनी है कि इंसान सोचकर ही सिहर उठे. यह विनाश अचानक नहीं आएगा, बल्कि हमारी आंखों के सामने, बेहद चुपचाप, धीरे-धीरे आकार लेगा और शायद तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

धरती पर बरसेगा सितम

अगले 20 सालों में लगातार गर्म होती धरती, पिघलते ग्लेशियर और समुद्र में समाते द्वीप इंसानों को सोचने पर मजबूर कर देंगे. पहला विनाश मौसम के स्वभाव में दिखाई देगा. धरती का जो संतुलन हजारों सालों से जीवन को साधे है वह डगमगाने लगेगा. बारिश समय पर नहीं आएगी, और जब आएगी तो इतनी बारिश होगी कि हर चीज तबाह हो जाएगा. गर्मी सिर्फ तापमान नहीं बढ़ाएगी, वह इंसानों की सहनशक्ति को जलाएगी.

समुद्र खामोशी से जमीन की ओर बढ़ेगा, ठीक वैसे ही जैसे कोई साहूकार लंबे समय से भूला हुआ अपना कर्ज चुपचाप वसूलने चला हो. यह विनाश इसलिए और अधिक भयावह होगा, क्योंकि यह किसी धमाके की तरह अचानक नहीं आएगा, बल्कि बेहद धीमी गति से फैलता जाएगा. इंसान इसे अपनी रोजमर्रा की परेशानियों का हिस्सा समझकर लगातार नजरअंदाज करता रहेगा और जब तक उसकी गंभीरता समझ में आएगी, तब तक बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होगा.

जलवायु शरणार्थी शब्द बनेगा आम

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से समुद्र का तल लगातार बढ़ता जा रहा है. अगले 20 से 30 सालों में वह बड़ा संकट बन जाएगा. समुद्री इलाकों से बड़े पैमाने पर पलायन होगा. खाने और पीने की कीमतें राजनीति तय करने लगेंगी. जिसकी वजह से जलवायु शरणार्थी आम शब्द बन जाएगा.

सामाजिक संरचना टूट जाएगी

AI के अनुसार अगले 40 से 50 वर्षों में यह संकट केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज की जड़ों में उतर जाएगा. जो हवा, पानी और भोजन कभी साझा किए जाते थे, वही संसाधन संघर्ष और टकराव की वजह बन जाएंगे. सीमाएं अब नक्शों से नहीं, बल्कि जलवायु से तय होने लगेंगी.

जो लोग अपने घर छोड़ने से इनकार करेंगे, उन्हें परिस्थितियां जबरन पलायन के लिए मजबूर कर देंगी. शहर धीरे-धीरे बोझ बन जाएंगे और गांव उजड़कर बंजर होने लगेंगे. सबसे दुखद पहलू यह होगा कि इंसान इस तबाही के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराने के बजाय प्रकृति को दोष देने लगेगा. लेकिन असली विनाश बाहर नहीं, इंसान के भीतर घटेगा. अगले 50 से 60 वर्षों में संवेदनाएं थकान में बदलने लगेंगी और बदलाव की इच्छाशक्ति धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी. उस दौर में सभ्यता खड़ी तो रहेगी, लेकिन भीतर से खोखली होगी—जीवित तो होगी, पर जीवंत नहीं.

कैसे आए सुधार ?

AI ने बताया कि इस विनाश के दौर में भी उम्मीद की किरण सिर्फ इंसान ही होंगे. अगर इंसान सरकार के भाषणों की जगह खुद को बदलने लगे तो वह इस परेशानी से काफी हद तक निकल सकता है. इंसान जब खुद से सवाल पूछने लगेगा कि मुझे क्या और कितना चाहिये. वह अपनी अगली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ रहा है?

AI ने अंत में यह स्वीकार किया कि वह यह नहीं कह सकता कि इतने बड़े संकट से धरती बचेगी या इंसान. वह बस इतना देख सकता है कि जिस प्रजाति को सब कुछ मिला, उसने समय रहते अपनी जिम्मेदारी समझी या नहीं. यही एक फैसला करेगा कि आने वाला विनाश अंतिम साबित होगा, या फिर वह एक चेतावनी बनकर रुक जाएगा—एक ऐसा मोड़, जहां से इंसान अब भी अपनी दिशा बदल सकता है.

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