CBI के संयुक्त निदेशक दोषी करार! IRS अधिकारी के घर जबरन घुसने और मारपीट मामले में दिल्ली तीस हजारी कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Shivam
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दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने एक अहम और लंबे समय से लंबित मामले में फैसला सुनाते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के दो वरिष्ठ अधिकारियों को दोषी ठहराया है. यह मामला वर्ष 2000 में एक IRS अधिकारी के घर तड़के की गई छापेमारी और गिरफ्तारी से जुड़ा है. अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी और इसका उद्देश्य केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश को निष्प्रभावी करना था. करीब ढाई दशक बाद आए इस फैसले को प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

किन अधिकारियों को ठहराया गया दोषी?

अदालत ने वर्तमान में CBI में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत रमनीश (जो वर्ष 2000 में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस, SIU-8, CBI में तैनात थे) और वी.के. पांडे, सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त, दिल्ली (जो उस समय SIU-9, CBI में इंस्पेक्टर थे), को दोषी करार दिया है.

दोनों अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 427, 448 और 34 के तहत दोषी पाया गया. इन धाराओं में जानबूझकर चोट पहुंचाना, शरारत, आपराधिक अतिक्रमण और साझा इरादे से अपराध करना शामिल है. यह फैसला तीस हजारी कोर्ट में पश्चिम जिला के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी शशांक नंदन भट्ट की अदालत ने 18 अप्रैल 2026 को सुनाया.

मामले की शुरुआत: 19 अक्टूबर 2000 की घटना

यह मामला 19 अक्टूबर 2000 की सुबह लगभग 5 बजे शुरू होता है, जब CBI की एक टीम शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल के घर पहुंची. अशोक कुमार अग्रवाल 1985 बैच के IRS अधिकारी हैं और उस समय दिल्ली जोन में प्रवर्तन निदेशालय (ED) में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत थे. आरोप है कि टीम ने गार्ड से पहचान पत्र मांगने पर उसके साथ मारपीट की, दीवार फांदकर घर में प्रवेश किया और मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ दिया. इसके बाद परिवार के सदस्यों को एक कमरे में बंद कर दिया गया.

जबरन कार्रवाई और मारपीट के आरोप

अदालत में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, शिकायतकर्ता को उनके बेडरूम से अंडरगारमेंट्स में ही घसीटकर बाहर लाया गया. सीढ़ियों पर उनके साथ मारपीट की गई, जिससे उनके दाहिने हाथ में चोट आई.

कोर्ट ने पाया कि यह तथ्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट (MLC) और आरोपी वी.के. पांडे के हलफनामे से भी प्रमाणित होता है. इसके बाद शिकायतकर्ता को पीरागढ़ी के पास ले जाया गया और बाद में अस्पताल पहुंचाया गया. अदालत ने साफ कहा कि 19 अक्टूबर 2000 को की गई तलाशी और गिरफ्तारी का एकमात्र उद्देश्य 28 सितंबर 2000 के CAT आदेश को निष्प्रभावी करना था, जिसमें शिकायतकर्ता के निलंबन की समीक्षा का निर्देश दिया गया था.

कोर्ट ने पाया कि आरोपियों ने घर का मुख्य दरवाजा तोड़ा, जो आपराधिक अतिक्रमण और शरारत की श्रेणी में आता है. यह तथ्य खुद आरोपियों की सर्च लिस्ट से भी प्रमाणित हुआ. अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता को घसीटकर बाहर लाया गया और उनके साथ मारपीट की गई. मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयान से यह पूरी तरह साबित हुआ.

CAT आदेश को निष्प्रभावी करने की योजना

अदालत ने कहा कि CAT के निर्देश के अनुसार 18 अक्टूबर 2000 तक जवाब भेजने के बजाय, CBI अधिकारियों ने उसी शाम एक गुप्त बैठक की और अगले दिन छापेमारी व गिरफ्तारी का फैसला लिया. कोर्ट ने इसे सोची-समझी साजिश बताया.

शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल उस समय संवेदनशील FERA मामलों की जांच कर रहे थे, जिनमें प्रभावशाली लोग शामिल थे. उन्होंने 1998-99 के दौरान राजस्व सचिव को कई बार शिकायत की कि उनकी जांच में हस्तक्षेप किया जा रहा है.

आरोप है कि बदले की भावना से उनके खिलाफ अभिषेक वर्मा द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई और CBI अधिकारियों की मिलीभगत से FIR दर्ज हुई. हालांकि, बाद में दर्ज दोनों मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया, जिससे उनका पक्ष मजबूत हुआ.

अदालत ने स्पष्ट कहा कि आरोपियों को CrPC की धारा 197 या दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के तहत कोई संरक्षण नहीं मिल सकता, क्योंकि उनके कृत्य आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में नहीं आते. कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट (2016) और सुप्रीम कोर्ट (2023) के फैसलों का हवाला देते हुए इस निष्कर्ष को सही ठहराया.

बचाव पक्ष की दलीलें खारिज

अदालत ने बचाव पक्ष के तर्कों को असंगत और अविश्वसनीय बताया. बयान आपस में मेल नहीं खाते थे—एक तरफ दरवाजा तोड़ने की बात स्वीकार की गई, जबकि दूसरी तरफ केवल कुंडी टूटने की बात कही गई. मेडिकल रिपोर्ट को भी अदालत ने वैध माना और कहा कि इसे पहले स्वयं आरोपी ने स्वीकार किया था.

शिकायत में देरी को माना गया उचित

कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज करने में हुई देरी स्वाभाविक थी, क्योंकि आरोपी प्रभावशाली पदों पर थे और शिकायतकर्ता को धमकाया गया था. अदालत ने दोनों अधिकारियों को दोषी ठहराया है, जबकि सजा का ऐलान अगली सुनवाई में किया जाएगा. दोषी अधिकारियों के पास उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार रहेगा.

अदालत ने स्पष्ट कहा कि 19 अक्टूबर 2000 को की गई पूरी कार्रवाई कानून का गंभीर उल्लंघन थी और इसका उद्देश्य CAT आदेश को निष्प्रभावी करना था. इसे एक सोची-समझी साजिश करार दिया गया. इस ऐतिहासिक फैसले के साथ, CBI के संयुक्त निदेशक रमनीश और वी.के. पांडे को IPC की धारा 323/427/448/34 के तहत दोषी ठहराया गया.

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