Coal Gangue Research: कोयला खदानों का बेकार कचरा अब करेगा गंदे पानी की सफाई! रिसर्च में सामने आई नई उम्मीद

Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Coal Gangue Research: अब तक कोयला खदानों से निकलने वाले कोल गैंग्यू (Coal Gangue) को सिर्फ एक बेकार ठोस कचरा माना जाता था. इसे बड़े-बड़े ढेरों में फेंक दिया जाता था या फिर कम लागत वाले निर्माण कार्यों में भराव सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन अब एक नई वैज्ञानिक समीक्षा (रिव्यू स्टडी) ने इस सोच को बदलने की दिशा दिखाई है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यही कचरा भविष्य में गंदे पानी को साफ करने वाला एक प्रभावी उत्प्रेरक बन सकता है. अगर इस तकनीक पर आगे सफल परीक्षण होते हैं, तो यह जल प्रदूषण और ठोस अपशिष्ट, दोनों समस्याओं से निपटने में अहम भूमिका निभा सकता है.

कोल गैंग्यू को लेकर रिसर्च में क्या सामने आया?

रिसर्च में बताया गया है कि अगर कोल गैंग्यू को सही तरीके से प्रोसेस किया जाए, तो यह पेरॉक्सीमोनोसल्फेट (PMS) नाम के शक्तिशाली ऑक्सीडेंट को सक्रिय कर सकता है. PMS ऐसे रसायनों को भी तोड़ने में सक्षम है, जो सामान्य जल शोधन तकनीकों से आसानी से खत्म नहीं होते. यानी यह तकनीक औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद जिद्दी और जहरीले कार्बनिक प्रदूषकों को हटाने में काफी मददगार साबित हो सकती है.

इस अध्ययन के प्रमुख लेखक लिक्सिन ली का कहना है, “अब समय आ गया है कि कोल गैंग्यू को सिर्फ एक निष्क्रिय पदार्थ न माना जाए. इसकी अपनी खनिज संरचना भी रासायनिक प्रतिक्रियाओं में अहम भूमिका निभा सकती है. अगर इसकी प्राकृतिक क्षमता को सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और फिर इसके साथ उपयुक्त सक्रिय तत्व जोड़े जाएं, तो इससे ज्यादा असरदार और व्यावहारिक जल शोधन तकनीक विकसित की जा सकती है.”

क्यों खास है कोल गैंग्यू की संरचना?

दरअसल, कोयला खनन और प्रोसेसिंग के दौरान बड़ी मात्रा में कोल गैंग्यू निकलता है. इसे खुले मैदानों में जमा कर दिया जाता है, जिससे कई पर्यावरणीय समस्याएं पैदा होती हैं. इसके ढेर जमीन घेरते हैं, मिट्टी के कटाव को बढ़ाते हैं और समय के साथ इनमें मौजूद अम्लीय पदार्थ, नमक तथा धातुएं आसपास की मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकती हैं. हालांकि, इसी कचरे में सिलिका, एल्यूमिना, लौह युक्त खनिज और कई सूक्ष्म धातुएं भी मौजूद होती हैं, जो इसे एक संभावित उत्प्रेरक बनाती हैं. यही वजह है कि वैज्ञानिक अब इसे बेकार कचरे की बजाय उपयोगी संसाधन के रूप में देख रहे हैं.

कैसे तैयार होगा प्रभावी कैटेलिस्ट?

रिसर्च में बताया गया है कि अगर इस सामग्री पर गर्मी, ग्राइंडिंग और रासायनिक उपचार जैसे तरीके अपनाए जाएं, तो इसकी संरचना बदल जाती है. गर्म करने से इसके स्थिर खनिज अधिक सक्रिय रूप में बदल जाते हैं. ग्राइंडिंग से इसके कण छोटे हो जाते हैं, नई सतहें बनती हैं और कई सूक्ष्म दोष पैदा होते हैं, जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज करते हैं. वहीं, एसिड या क्षारीय उपचार से इसकी सतह, छिद्र और रासायनिक गुणों में बदलाव आता है. इन सभी प्रक्रियाओं का सही संयोजन इसे PMS के साथ बेहतर तरीके से काम करने लायक बना सकता है.

कैसे होती है गंदे पानी की सफाई?

जब पेरॉक्सीमोनोसल्फेट (PMS) सक्रिय होता है, तो यह सल्फेट रेडिकल, हाइड्रॉक्सिल रेडिकल और सिंगलेट ऑक्सीजन जैसे बेहद सक्रिय रासायनिक कण पैदा करता है. ये कण पानी में मौजूद जहरीले कार्बनिक प्रदूषकों को तोड़कर कम हानिकारक पदार्थों में बदल देते हैं. कई मामलों में यह प्रक्रिया सीधे इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर के जरिए भी होती है. कौन-सा तरीका ज्यादा प्रभावी होगा, यह कैटेलिस्ट की संरचना, प्रदूषक की प्रकृति और पानी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है.

किन प्रदूषकों पर हुई तकनीक की जांच?

शोधकर्ताओं ने टेट्रासाइक्लिन एंटीबायोटिक और फिनॉलिक यौगिकों को इस तकनीक की जांच के लिए सबसे उपयुक्त प्रदूषक बताया है. टेट्रासाइक्लिन की रासायनिक संरचना काफी जटिल होती है, इसलिए यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कैटेलिस्ट कितनी अच्छी तरह प्रदूषकों को अपनी सतह पर पकड़कर उन्हें तोड़ सकता है. वहीं, फिनॉलिक यौगिकों से यह समझने में मदद मिलती है कि सफाई की प्रक्रिया मुख्य रूप से रेडिकल आधारित है या किसी अन्य तरीके से हो रही है.

वैज्ञानिकों ने किन चुनौतियों का किया जिक्र?

रिसर्च का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि भविष्य में कैटेलिस्ट तैयार करते समय सबसे पहले कोल गैंग्यू की अपनी प्राकृतिक ऑक्सीडेशन क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए. इसके बाद ही बाहरी धातुओं या अन्य सक्रिय तत्वों को जोड़ा जाना चाहिए, ताकि दोनों मिलकर अधिक प्रभावी परिणाम दे सकें. हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि सिर्फ लैब में अच्छे नतीजे मिल जाना पर्याप्त नहीं है. किसी तकनीक को वास्तव में उपयोगी तभी माना जाएगा, जब उसका परीक्षण वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल पर किया जाए.

इसके अलावा यह भी देखना होगा कि कैटेलिस्ट को कितनी बार दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, कहीं उससे धातुएं पानी में तो नहीं घुल रहीं, प्रदूषकों के टूटने के बाद बनने वाले पदार्थ सुरक्षित हैं या नहीं, और पूरी प्रक्रिया की लागत तथा ऊर्जा खपत कितनी है. शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर इन सभी पहलुओं पर सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो कोयला खदानों का यह बेकार कचरा भविष्य में जल प्रदूषण और ठोस अपशिष्ट, दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान बन सकता है.

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