अभी भी अपने वजूद को बचाने में जुटी हैं ममता बनर्जी, यूसुफ पठान की राजनीतिक बलि देकर पहुंचेंगी संसद, TMC में मंथन शुरू

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Mamata Banerjee New Politics: पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ से जाने के बाद ममता बनर्जी अभी भी अपने वजूद को बचाने के लिए जुटी हुई हैं. भवानीपुर विधानसभा सीट पर मिली करारी शिकस्त ने TMC के खेमे में सन्नाटा पसरा दिया है. वहीं खबर है कि ममता बनर्जी अब संसद के रास्ते अपनी खोई हुई जमीन वापस लाना चाहती हैं. इसके लिए उन्होंने बहरामपुर लोकसभा सीट को चुना है, जहां से वर्तमान में पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान सांसद हैं.

यह रास्ता इतना आसान नहीं

जानकारी मिल रही है कि यूसुफ पठान से इस्तीफा दिलाकर ममता खुद वहां से उपचुनाव लड़ सकती हैं. लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है. एक तरफ भाजपा का बढ़ता ग्राफ और दूसरी तरफ साख बचाने की चुनौती…! अगर बहरामपुर में भी पासा उल्टा पड़ा तो दीदी की रही-सही इज्जत भी दांव पर लग जाएगी. TMC के अंदरखाने इस पर मंथन शुरू हो चुका है. बहरामपुर हमेशा से बंगाल की राजनीति का सबसे दिलचस्प मोड़ रहा है.

अधीर रंजन चौधरी का अभेद्य किला

कभी इसे अधीर रंजन चौधरी का अभेद्य किला माना जाता था, जिसे 2024 में यूसुफ पठान ने ढहा दिया था. अब उसी पिच पर ममता बनर्जी खुद बैटिंग करने की तैयारी में हैं. टीएमसी के रणनीतिकारों को लगता है कि ममता का संसद पहुंचना भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर माहौल बनाने के लिए जरूरी है. लेकिन राजनीति में टाइमिंग का बड़ा महत्व होता है. यूसुफ पठान को जब राजनीति में लाया गया था, तो वह ममता का ‘ट्रम्प कार्ड’ थे. उन्होंने अपना काम बखूबी किया और कांग्रेस के दिग्गज अधीर को पटखनी दी.

यूसुफ पठान की अपनी एक फैन फॉलोइंग

अब खबर है कि ममता बनर्जी के लिए यूसुफ को अपनी सीट छोड़नी पड़ सकती है. इसे यूसुफ की राजनीतिक बलि के तौर पर देखा जा रहा है. यूसुफ पठान की अपनी एक फैन फॉलोइंग है और उनके अचानक हटने से टीएमसी के भीतर भी असंतोष की लहर दौड़ सकती है. बहरामपुर अब वो पुराना गढ़ नहीं रहा जहां सिर्फ टीएमसी या कांग्रेस का कब्जा हो. 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सुब्रत मैत्रा ने जिस तरह से अपनी धाक जमाई है, उसने साफ कर दिया है कि बहरामपुर का मिजाज बदल चुका है.

‘हारी हुई CM’ बनाम ‘स्थानीय चेहरा’ का मुद्दा

भाजपा ने यहां अपनी जड़ें काफी गहरी कर ली हैं. अगर ममता यहां से उपचुनाव लड़ती हैं, तो भाजपा इसे ‘हारी हुई मुख्यमंत्री’ बनाम ‘स्थानीय चेहरा’ का मुद्दा बनाएगी. सुब्रत मैत्रा की जीत ने भाजपा कार्यकर्ताओं में जो जोश भरा है, वह ममता के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है. यहाँ की मिट्टी में अब कमल की खुशबू तेजी से फैल रही है.

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