PSLV Rocket : इसरो के वर्क हॉर्स कहे जाने वाले PSLV रॉकेट की बार-बार विफलता ने सरकार और वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. ऐसा पहली बार हुआ है कि इंटरनल टीम के साथ-साथ पीएसएलवी के फेलियर के एनालिसिस के लिए इसरो से रिटायर्ड वैज्ञानिकों की एक टीम बनाई गई है. देश के दो शीर्ष वैज्ञानिक सोमनाथ और के.राघवन पीएसएलवी की विफलता के हर पहलू की जांच करेंगे. प्राप्त जानकारी के अनुसार इसरो के एक विश्वसनीय सूत्र ने बताया कि ये टीम इस बात की भी जांच करेगी कि क्या इन विफलताओं के पीछे क्या किसी तरह का कोई “संगठनात्मक” कारण तो नहीं है.
वैज्ञानिकों को मिली जिम्मेदारी
जानकारी के मुताबिक, इसरो ने अपने भरोसेमंद प्रक्षेपणयान पीएसएलवी पर वापस भरोसा कायम करने के लिए वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन को एक खास टास्क दिया है. बता दें कि इसरो ने इन दो वैज्ञानिकों की एक समिति गठित की है, जो पीएसएलवी की विफलता के विभिन्न पहलुओं की जांच व्यस्थित और चरणबद्ध तरीके से करेगी.
लगातार दो मिशन हुए असफल
इसके साथ ही इसरो की ओर से दिए गए एक बयान में कहा गया कि राष्ट्रीय स्तर की एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई है, जो पीएसएलवी प्रक्षेपणयान में आई विसंगति के कारणों की समीक्षा कर रही है. जानकारी के मुताबिक, पीएसएलवी के पिछले लगभग 32 वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि इसके दो मिशन लगातार विफल हुए हैं. पिछले साल 18 मई 2025 को पीएसएलवी सी-61 से सी-बैंड सिंथेटिक अपर्चर राडार उपग्रह ईओएस-09 लॉन्च किया गया था, जो कि देश की सीमाओं की निगरानी और दुश्मनों के ठिकानों का मानचित्रण करने के लिए था. लेकिन प्रक्षेपण के करीब 6 मिनट 20 सेकेंड बाद पीएसएलवी अपने निर्धारित पथ से अलग हो गया.
इसके बाद फिर 12 जनवरी 2026 को पीएसएलवी सी-62 भी प्रक्षेपण के करीब 6 मिनट 20 सेकेंड बाद पथ से अलग हो गया, इसकी वजह से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह ईओएस एन-1 (अन्वेष) समेत 15 अन्य उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका.
तकनीकी पहलुओं की जांच करेगी कमेटी
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि विशेषज्ञ समिति अप्रैल के पहले अपनी रिपोर्ट इसरो अध्यक्ष वी.नारायणन को सौंपेगी. बता दें कि इस समिति तकनीकी पहलुओं के अलावा इस बात पर भी गौर करेगी कि कहीं पीएसएलवी की विफलता में संगठनात्मक समस्याओं की भूमिका तो नहीं हैं. इसके साथ ही समिति रॉकेट के विभिन्न घटकों के निर्माण और असेंबली की प्रक्रियाओं की भी जांच करेगी. ऐसा में माना जा रहा है कि यह जांच केवल इस बात तक सीमित नहीं होगी कि कौन-सा पुर्जा या घटक विफल हुआ और जिम्मेदार कौन था, बल्कि यह भी पता लगाया जाएगा कि जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया मौजूद है या नहीं और उसे कैसे बेहतर बनाया जा सकता है.
जीएसएलवी रॉकेट की लगातार विफलता
बता दें कि समिति में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ को भी रखा गया है. बताया जा रहा है कि सोमनाथ का जुड़ाव रॉकेट प्रणाली से रहा है और वे देश के सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 के परियोजना निदेशक भी रहे. जानकारी के मुताबिक, एक ऐसा समय था जब जीएसएलवी रॉकेट की लगातार विफलता के कारण उसे नॉटी ब्वॉय की संज्ञा दी गई थी. उसी समय सोमनाथ को उसकी जिम्मेदारी सौंपी गई और जीएसएलवी आज इसरो का सबसे विश्वसनीय रॉकेट है. बता दें कि सोमनाथ रॉकेटों के सभी चरणों और तरल इंजनों के निर्माण की जिम्मेदारी संभालते रहे हैं.
पीएसएलवी को सही रास्ते में लाने की मिली जिम्मेदारी
इसके साथ ही रॉकेट के सिस्टम इंजीनियरिंग, संरचनागत डिजाइनिंग के साथ और भी इससे जुड़ी कई चीजें पायरो तकनीक के विशेषज्ञ माने जाते हैं. इन क्षेत्रों में उनका व्यापक अनुभव रहा है. बताया जा रहा है कि वर्ष 1985 में जब उन्होंने इसरो ज्वाइन किया, तो विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) में पीएसएलवी के विकास परियोजना से जुड़े. इतना ही नही बल्कि इसरो से सेवानिवृत होने के बाद फिर एक बार उन्हें पीएसएलवी को सही रास्ते में लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
फेलियर एनालिसिस के बाद प्रक्षेपण की तारीखों पर विचार
फिलहाल इसरो के लिए राहत की बात ये है कि पीएसएलवी की असफलता के बावजूद भविष्य के प्रक्षेपणों पर कोई बहुत प्रतिकुल असर नहीं पड़ा है, ऐसे में लॉन्च में देरी होना तय है क्योंकि उनका कहना है कि फेलियर एनालिसिस के बाद ही अगले प्रक्षेपण की तारीखों पर विचार होगा, लेकिन अब एक ओर असफलता इसरो को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. इसीलिए इंटरनल कमेटी के साथ-साथ पहली बार एक्सटर्नल कमेटी भी असफलता के हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है.
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