BSIP के 78वें स्थापना दिवस पर वैज्ञानिकों ने प्रोफेसर बीरबल साहनी की उपलब्धियों को किया याद

78th Foundation Day of BSIP: भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक प्रतिष्ठित संस्थान, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी) ने 10 सितंबर, 2024 को अपने परिसर में अपना 78वां स्थापना दिवस समारोह मनाया. 1946 में स्थापित, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज पौधों, जानवरों और अन्य जीवों के जीवाश्म अवशेषों के अध्ययन के लिए एक समर्पित अग्रणी शोध संस्थान है. यह संस्थान पृथ्वी के भूवैज्ञानिक और जैविक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कार्यक्रम की शुरुआत वैज्ञानिक डॉ. शिल्पा पांडे द्वारा बीएसआईपी और इसके गौरवशाली इतिहास के संक्षिप्त परिचय के साथ हुई. पंडित दीनदयाल ऊर्जा विश्वविद्यालय, गांधीनगर के महानिदेशक डॉ. एस. सुंदर मनोहरन स्थापना दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे. समारोह की शुरुआत स्वर्गीय प्रोफेसर बीरबल साहनी (बीएसआईपी के संस्थापक) को पुष्पांजलि के साथ हुई, इसके बाद स्थापना दिवस व्याख्यान कार्यक्रम के साथ-साथ संस्थान की हिंदी पत्रिका का उद्घाटन भी हुआ.

78th Foundation Day of BSIP

बीएसआईपी के निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर ने भारतीय इतिहास के संघर्षपूर्ण समय के दौरान इस विश्व-प्रसिद्ध संस्थान की स्थापना हेतु प्रो. साहनी के उल्लेखनीय योगदान की झलक याद करते हुए सभा का स्वागत किया. उन्होंने अत्याधुनिक राष्ट्रीय अनुसंधान सुविधाओं के साथ-साथ संस्थान की वैज्ञानिक उपलब्धि पर भी प्रकाश डाला और विज्ञान के साथ-साथ राष्ट्र की दिशा में आगे की प्रगति के बारे में विस्तार से बताया. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च के निदेशक डॉ. भास्कर नारायण सम्मानित अतिथि के रूप में कार्यक्रम में मौजूद रहें. अपने संबोधन में उन्होंने संस्थान की प्रगति और उत्थान में “आईसीई कूल” होने के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने आगे बताया कि “आईसीई” में ‘आई’ का मतलब इनोवेशन, इंस्टीट्यूशन फर्स्ट और इंटीग्रिटी है; ‘सी’ का अर्थ सहयोग, योग्यता और प्रतिबद्धता; और ‘ई’ का मतलब समर्पण, सशक्तिकरण, और नैतिकता से है.
उन्होंने संस्थान में सभी को इन सिद्धांतों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बीएसआईपी वैज्ञानिक उत्कृष्टता के प्रतीक के रूप में हमेशा आगे बढ़ता रहें रहे. स्थापना दिवस व्याख्यान राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डी.के. पांडे (सेवानिवृत्त प्रोफेसर) द्वारा “कोरल, सभ्यता और भूवैज्ञानिक महत्व” विषय पर दिया गया था. अपने व्याख्यान के दौरान, उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि कोरल एंथोज़ोआ वर्ग के भीतर औपनिवेशिक समुद्री अकशेरूकीय हैं, जो आम तौर पर कई समान व्यक्तिगत पॉलीप्स की कॉम्पैक्ट कॉलोनियां बनाते हैं, जो उष्णकटिबंधीय महासागरों में निवास करते हैं और एक कठोर कंकाल बनाने के लिए कैल्शियम कार्बोनेट का स्राव करते हैं. मूंगा चट्टानें समुद्री तटों को तूफानों और कटाव से बचाती हैं, स्थानीय समुदायों को रोजगार प्रदान करती हैं.
दुनिया भर में लगभग 6 मिलियन मछुआरे इस पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर हैं, जिसकी वैश्विक स्तर पर प्रति वर्ष अनुमानित अर्थव्यवस्था 375 बिलियन अमेरिकी डॉलर है. इसके अलावा, कोरल के कंकाल का उपयोग मल्टीपल स्केलेरोसिस, कैंसर, हृदय रोग और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए कैल्शियम पूरक के रूप में किया जाता है. इन कोरल को मानवीय गतिविधियों से बचाने और संरक्षित करने की सख्त जरूरत है. कार्यक्रम में राजभाषा समिति की संयोजक डॉ. पूनम वर्मा द्वारा हिंदी पखवाड़े का उद्घाटन भी किया गया, जिसमें आधिकारिक गतिविधियों में हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने में संस्थान के समर्पण पर प्रकाश डाला गया. 78वें स्थापना दिवस पर मुख्य अतिथि एवं मंच पर मौजूद अन्य गणमान्य अतिथियों ने संस्थान की वार्षिक हिंदी पत्रिका “पुराविज्ञान स्मारिका” के तीसरे खंड का विमोचन किया, जो वैज्ञानिक डॉ. पूनम वर्मा (संपादक), डॉ. स्वाति त्रिपाठी और डॉ. नीलम दास द्वारा संपादित एवं सह-संपादित है.

पत्रिका में जनता के लिए सामान्य, समसामयिक, शोध और तकनीकी लेख शामिल हैं. इसके अलावा, इस हिंदी पत्रिका में आम लोगों तक पुराविज्ञान ज्ञान का प्रसार करने के लिए वैज्ञानिकों और अनुसंधान विद्वानों द्वारा किए गए क्षेत्र भ्रमण की तस्वीरें और अन्य आउटरीच गतिविधियां शामिल हैं. शोध विद्वान (डॉ. सुयश गुप्ता, डॉ. योगेश पाल सिंह, डॉ. सचिन कुमार, डॉ. प्रिया अग्निहोत्री, डॉ. काजल चंद्रा, डॉ. हर्षिता भाटिया, डॉ. पूजा तिवारी, डॉ. बेन्सी डेविड चिंताला, डॉ. हिदायतुल्ला, डॉ. प्रियंका सिंह, डॉ. शालिनी परमार, डॉ. लोपामुद्रा रॉय, डॉ. मसूद कंवर, डॉ. राज कुमार और डॉ. सर्वेंद्र प्रताप सिंह) जिन्हें पिछले एक वर्ष के दौरान डॉक्टरेट की डिग्री प्रदान की गई है, को संस्थापक दिवस समारोह में सम्मानित किया गया है.
दक्षिण कोरिया, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और चेक गणराज्य में आयोजित विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में बीएसआईपी और भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले वैज्ञानिकों (डॉ. पूनम वर्मा, विवेश वीर कपूर, नीरज राय, अद्रिता चौधरी, रणवीर सिंह नेगी) एवं शोध विद्वानो (आर्या पांडे, सूरज कुमार साहू, पूजा तिवारी, देवेश्वर प्रकाश मिश्रा, निधि तोमर, पियाल हलधर) को भी समारोह में सम्मानित किया गया. वर्तिका सिंह, सबेरा खातून, प्रिया दीक्षित और महबूब आलम जैसे शोध विद्वानों को भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों में उनके चयन के लिए सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध जीवाश्म विज्ञानी प्रो. अशोक साहनी और संस्थान के सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों सहित अन्य प्रतिष्ठित सदस्यों ने समारोह में भाग लिया. जीएसआई, लखनऊ विश्वविद्यालय और अन्य संगठनो के भूवैज्ञानिक/वैज्ञानिक/प्रोफेसर भी इस समारोह में शामिल हुए.
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