राजनीतिक बवाल से नहीं सुलझेंगे बालासोर के सवाल

Upendrra Rai
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Chairman & Managing Director, Editor-in-Chief, The Printlines | Bharat Express News Network
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बालासोर रेल दुर्घटना के बाद अब प्रभावित ट्रैक पर भले ही यातायात सामान्य हो गया हो लेकिन मौजूदा सदी के इस भीषणतम रेल हादसे से जुड़ी कई ऐसी असामान्य बातें हैं जिन्हें सामान्य होने में काफी वक्त लग सकता है। दुर्घटना में अपने परिजनों को गंवाने वाले ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जिनके नुकसान की कोई भरपाई नहीं हो सकती। आने वाला वक्त शायद उनके जख्मों पर मरहम लगाए लेकिन जो बीत गया है वो अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गया है जिससे सबक लिए जाने की जरूरत है। रेल सुरक्षा के प्रश्न के साथ-साथ अब इस सवाल को भी संबोधित करना आवश्यक हो गया है कि सरकार चाहे जो भी हो, किसी भी हादसे के बाद उसे कटघरे में खड़े करने की जल्दबाजी में संवेदनशीलता और मानवीयता को ताक पर रखकर हादसे पर राजनीति करना कितना उचित है? बालासोर में ट्रिपल ट्रेन दुर्घटना के बाद देश के राजनीतिक विपक्ष ने लालबहादुर शास्त्री और नीतीश कुमार का हवाला देते हुए केन्द्र सरकार की जवाबदेही और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से इस्तीफे की मांग करने में जो ‘तेजी’ दिखाई, उसके बाद इस दुखद हादसे में एक नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। हादसे के तुरंत बाद करीब-करीब एक ही समय पर घटनास्थल पर पहुंचे रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच एक विवाद कैमरे में कैद हो गया जिसमें ममता बनर्जी मारे गए यात्रियों की संख्या 500 बताती सुनी गईं जबकि अश्विनी वैष्णव उनके बयान को खारिज करते हुए सुने गए कि यह राजनीति का समय नहीं है। इसके बावजूद इस मामले पर राजनीति तो जमकर हुई है।

ममता बनर्जी की ही पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने अश्विनी वैष्णव के पास दो अन्य मंत्रालय होने पर सवाल उठाते हुए पूछा कि देश में पूर्णकालिक रेल मंत्री क्यों नहीं है? इस सवाल से तो ऐसा मतलब निकलता है जैसे पूर्णकालिक रेल मंत्री के होते हुए देश में कभी कोई रेल दुर्घटना ही नहीं हुई हो। शिवसेना उद्धव गुट की ओर से भी जांच पर आपत्ति जताते हुए कहा गया है कि आगे चलकर इस दुर्घटना को भी ‘भगवान की इच्छा’ बताकर गुनहगारों को बचा लिया जाएगा जैसा कि गुजरात के मोरबी पुल हादसे में किया गया।  देश के सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस ने भी दुर्घटना की जांच सीबीआई को सौंपने के निर्णय को नरेन्द्र मोदी सरकार की अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए ‘हेडलाइन प्रबंधन’ की रणनीति का हिस्सा बताने में देर नहीं की। जबकि हकीकत ये है कि खुद रेलवे के अधिकारी मान रहे हैं कि ये घटना कई मामलों में अपवाद है और साधारण जांच से घटना से जुड़े तमाम असाधारण सवालों के जवाब तलाशना संभव नहीं है। घटना का मूल कारण इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम में अचानक हुआ बदलाव है जिसके कारण कोरोमंडल एक्सप्रेस अपनी पटरी बदलकर लूप लाइन पर खड़ी मालगाड़ी से भिड़ गई। ये कोई तकनीकी खराबी नहीं है। यह सिस्टम से मानवीय छेड़छाड़ के बिना संभव नहीं है।

सीबीआई से जांच होगी तो इसके पीछे का मकसद पता चलेगा। जांच में मानवीय और तकनीकी दोनों पक्ष के लिप्त होने की आशंका भी इसे सीबीआई के लिए एक उपयुक्त मामला बनाती है क्योंकि भारत में कई सरकारी एजेंसियां उन्नत स्तर की तकनीकी जांच की योग्यता नहीं रखती हैं। हैरानी इस बात को लेकर भी है कि इतने व्यापक उपयोग के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम के नाकाम होने के गिने-चुने मामले ही प्रकाश में आए हैं। ऐसे में दुर्घटना की असामान्य प्रकृति के कारण ये मामला एक जटिल जांच में बदल गया है। इसलिए यदि इस जांच को सामान्य विशेषज्ञता रखने वाली किसी नौकरशाह समिति के भरोसे छोड़ दिया जाता है तो ये मुद्दा न केवल लंबे समय तक उलझा रह सकता है, बल्कि उतने समय तक रेलों में सफर करने वाले लाखों-करोड़ों यात्रियों की जान पर भी अनहोनी की तलवार लटकी रह सकती है। फिर सीबीआई को जांच सौंपने से बहुत सारे अधिकार क्षेत्र और लालफीताशाही के मुद्दे भी हल हो जाते हैं। गौर करने वाली बात ये है कि इस मामले में बढ़-चढ़कर प्रधानमंत्री मोदी से जवाबतलब और रेल मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे ज्यादातर नेता किसी-न-किसी वक्त में देश के रेल मंत्री रह चुके हैं। वे स्वयं इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होंगे कि बेशक हर दुर्घटना का कोई-न-कोई जिम्मेदार अवश्य होता है लेकिन क्या महज एक मंत्री के इस्तीफे से सिस्टम की खामियां रातों-रात दूर हो सकती हैं?

अगर ऐसा होता तो हर सिस्टम चाक-चौबंद हो जाता। वैसे भी देखा जाए तो जिस तरह बालासोर की घटना का हाल के दशक में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता, उसी तरह इस मामले में रेल मंत्री की प्रतिक्रिया भी अभूतपूर्व दिखती है। वे देर शाम हुई दुर्घटना की अगली सुबह घटनास्थल पर मौजूद थे और फिर उसके बाद तत्काल राहत और बचाव कार्य से लेकर रेल रूट को सामान्य बनाने तक 50 घंटे से ज्यादा वक्त तक ग्राउंड जीरो पर डटे रहे। रेल मंत्री की लगातार उपस्थिति से विभिन्न एजेंसियों में सहयोग और समन्वय का भाव भी बना रहा। दुर्घटना के 51 घंटे के अंदर दोनों ट्रैकों की जांच कर ली गई और ट्रेन का परिचालन शुरू हो गया। आजाद भारत में शायद ऐसा पहली बार हुआ जब कोई रेल मंत्री दुर्घटना स्थल पर लगातार डटे रहे, राहत कार्य और नुकसान की निगरानी करते रहे। आज जब देश धीरे-धीरे इस रेल त्रासदी से उबर रहा है, तो उसके पीछे अपने दायित्वों के निर्वहन के प्रति रेलमंत्री के समर्पण को कैसे नजरंदाज किया जा सकता है? लेकिन साथ में सुरक्षित यात्रा के उन सवालों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता जो इस हादसे के बाद एक बार फिर हमारे सामने आ खड़े हुए हैं। ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में रोजाना 2.2 करोड़ लोग कहीं-न-कहीं यात्रा कर रहे होते हैं और इनमें बड़ा हिस्सा रेल से यात्रा करता है।

इसकी बड़ी वजह यह है कि रेल आज भी औसत भारतीय के लिए परिवहन का सबसे भरोसेमंद और सस्ता साधन है। इस भरोसे को बरकरार रखना भी सरकार का दायित्व है। जिस घटना में 275 से ज्यादा जानें चली गईं हों, 1000 से ज्यादा लोग घायल हुए हों, उस घटना का कोई-न-कोई जिम्मेदार, कोई-न-कोई वजह तो होगी ही। सवाल है कि जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए? इस हादसे से हम क्या सीखेंगे? क्या यह हादसा बड़े बदलाव का संकेत बनेगा? सबसे पहले तो हादसे की विस्तृत और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर को भले ही कितना भी आधुनिक बना दिया जाए, लेकिन अगर सुरक्षा और गुणवत्ता में सुधार नहीं हो रहा है तो इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। हम सब जानते हैं कि रेलवे में आजकल एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है। पहले जब दो रेलों के बीच आमने-सामने की टक्कर होती थी तो कोच एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते थे, लेकिन अब नए एंटी क्लाइम्बिंग कोच ट्रेनों में लगाए गए हैं जिनके बारे में दावा है कि ये खास तौर पर इस तरह से बने होते हैं कि टकराने पर एक-दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते। लेकिन बालासोर में ये दावा काम नहीं आया। इसी तरह पिछले साल से ‘कवच’ सिस्टम लॉन्च हुआ है जो सिग्नल पार करने और टक्कर रोकने के लिए ही डिजाइन किया गया है। इसमें अगर दो ट्रेन किसी कारण से एक ही पटरी पर आ जाएं, तो ये सिस्टम एक सुरक्षित दूरी पर अपने आप ब्रेक लगाकर ट्रेन को रोक सकता है। बालासोर हादसे के बाद इस सिस्टम को लेकर भी सवाल उठे हैं।

हालांकि अभी कवच सिस्टम देश के कुल 68 हजार किलोमीटर रेलवे नेटवर्क के सिर्फ 2.13 फीसदी हिस्से तक पहुंच पाया है और दुर्भाग्य से बालासोर मार्ग पर ये उपलब्ध नहीं था। सुरक्षा के बराबर ही अहम मसला रेलवे में कर्मचारियों की कमी का भी है।  पिछले दिसंबर में राज्यसभा में रेल मंत्री ने ही बताया था कि रेलवे में 3.12 लाख गैर-राजपत्रित पद खाली हैं, जिनमें से कई सुरक्षा श्रेणी में हैं। मानव संसाधन की इस किल्लत के कारण लोकोमोटिव पायलटों को निर्धारित 12 घंटे से अधिक काम करना पड़ रहा है। लंबे समय तक काम करने के घंटे और संबंधित तनाव रेल दुर्घटना का एक प्रमुख कारण भी बन जाता है। इनमें से कई सवाल देश के राजनीतिक विपक्ष ने भी उठाए हैं, हालांकि उसका तरीका अब आलोचना का विषय बन गया है। बेशक घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम होगा लेकिन ऐसे समय में जब आपदा से बाहर निकलने की तात्कालिक आवश्यकता मिलजुल कर प्रयास और कसूरवार की तलाश की होनी चाहिए, तब इस तरह के सवाल पूछकर विपक्ष ने स्वयं अपनी संवेदनशीलता और राजनीतिक जिम्मेदारी को ही कटघरे में ला खड़ा किया है।

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