Snake Robot: अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के इंजीनियरों ने एक ऐसा रोबोट तैयार किया जो सांप या केंचुए की तरह मानव शरीर की आंतों में रेंगते हुए आगे बढ़ सकता है. वैज्ञानिकों ने इस रोबोट को ‘बायोसेंटर’ (BIOSENTER) नाम दिया है. यह उपकरण पेट के सबसे संकरे और जटिल हिस्सों में खुद रास्ता बनाकर अंदर दाखिल हो सकता है. प्रतिष्ठित साइंस जर्नल ‘साइंस रोबोटिक्स’ में इस नए अविष्कार की पूरी रिपोर्ट पब्लिश की गई है.
मौजूदा समय में आंतों की जांच के लिए होने वाली प्रक्रियाएं मरीजों के लिए काफी दर्दनाक और जटिल साबित होती हैं.
ऐसे में यह रोबोट मरीज के मुंह या गुदा मार्ग से शरीर में प्रवेश कर सीधे छोटी आंत तक पहुंच सकता है. वहां पहुंचकर यह बीमारियों की सटीक पहचान करने के साथ-साथ बायोप्सी के लिए सैंपल भी निकाल सकता है.
छोटी आंत की जांच करना डॉक्टरों के लिए इतना मुश्किल क्यों?
दरअसल, मानव शरीर का पाचन तंत्र बेहद संकरा और घुमावदार रास्ता होता है. इंसान की छोटी आंत लगभग 20 से 25 फीट लंबी होती है. यह पेट के निचले हिस्से में बेहद तंग जगह में आपस में कई परतों में लिपटी रहती है. इसके दोनों तरफ आमाशय और बड़ी आंत मौजूद रहती हैं जिसके कारण यहां तक पारंपरिक कैमरों को पहुंचाना काफी मुश्किल होता है. छोटी आंत में ब्लीडिंग, ट्यूमर, घाव या रुकावट की समस्या आम होती जा रही है. समय पर पता न चलने से यह दिक्कत जानलेवा कैंसर का रूप ले लेती है.
वैज्ञानिकों ने ली सांप की चाल से प्रेरणा
ऐसे में इंजीनियरों ने अपने इस रोबोट को डिजाइन करने के लिए सांपों के चलने के तरीके का गहरा अध्ययन किया. सांप अपने शरीर के दोनों किनारों की मांसपेशियों को बारी-बारी से सिकोड़ते और फैलाते हैं. इसके अलावा सांप की त्वचा पर मौजूद स्केल्स यानी परतें उसे फिसलन भरी सतहों पर आगे बढ़ने की ग्रिप देती हैं. इसी सिद्धांत एमआईटी की टीम ने रबर जैसा बेहद लचीला और खोखला रोबोट तैयार किया. इस रोबोट की लंबाई करीब 3.7 इंच और चौड़ाई आधा इंच रखी गई है.
यह साइज इतना छोटा है कि यह भोजन नली और छोटी आंत के बेहद संकरे रास्तों से बिना रुकावट गुजर सकता है. बायोसेंटर के खोखले शरीर के दोनों किनारों पर चार हवा से फूलने वाले चैंबर बनाए गए हैं. इन चैंबर्स में बारी-बारी से हवा भरकर और निकालकर रोबोट को आगे बढ़ाया जाता है या दिशा बदली जाती है. वहीं, ग्रिप को बेहतर बनाने के लिए रोबोट की बाहरी सतह पर सांप की त्वचा जैसी परत चढ़ाई गई है.
कैसे काम करते हैं रोबोट के भीतर लगे हाईटेक टूल्स?
इस रोबोट के सिर और पिछले हिस्से को जापानी पेपर आर्ट ‘किरिगामी’ से प्रेरित होकर तैयार किया गया है. इस कला में कागज को केवल मोड़ा नहीं जाता बल्कि उसमें खास कट लगाए जाते हैं. इस खास डिजाइन की मदद से रोबोट के सिरे आंतों की अंदरूनी दीवार को पकड़ते हैं और फिर छोड़ते हैं.
इस रोबोट के खोखले शरीर के भीतर कई छोटे-छोटे मेडिकल टूल्स फिट किए गए हैं. इसमें एक हाई-डेफिनिशन माइक्रो कैमरा लगा है जो लाइव तस्वीरें भेजता है. इसके साथ ही इसमें दवा छिड़कने वाला एक खास स्प्रेयर भी जोड़ा गया है. बीमारी की पहचान के लिए इसमें छोटे क्लिपर्स दिए गए हैं जो संदिग्ध गांठ का टिश्यू सैंपल तुरंत काट लेते हैं. यह रोबोट एक पतली केबल के जरिए बाहरी कंट्रोल सिस्टम से जुड़ा रहता है. डॉक्टर इसे एक्स-बॉक्स कंट्रोलर जैसे रिमोट डिवाइस से भी आसानी से ऑपरेट कर सकते हैं.
सुअर के शरीर पर हुआ ट्रायल?
वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का पहला व्यावहारिक परीक्षण जीवित और बेहोश किए गए सुअरों पर किया. सुअर के पाचन तंत्र की आंतरिक बनावट इंसानी शरीर से काफी मिलती-जुलती होती है. लैब में हुए टेस्ट के दौरान इस रोबोट ने सुअर की आंतों में लगातार 11 मिनट तक सफलतापूर्वक सफर तय किया. इस दौरान रोबोट ने आंतों के भीतर की रीयल-टाइम तस्वीरें डॉक्टरों की स्क्रीन पर भेजीं. इसके साथ ही इसने तय लोकेशन पर तरल दवा की डिलीवरी की और बायोप्सी के लिए टिश्यू सैंपल भी सुरक्षित बाहर निकाले.
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में मेडिकल एंडोस्कोपी का चेहरा बदल देगी. इससे पहले साल 2021 में मकाऊ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मकड़ी से प्रेरित कैप्सूल रोबोट बनाया था जिसे मैग्नेट से कंट्रोल किया जाता था.
हालांकि एमआईटी का यह नया स्नेक रोबोट डॉक्टरों को शरीर के भीतर ज्यादा नियंत्रण और क्षमता देता है. मानव शरीर पर इसका ट्रायल पूरा होने के बाद यह पेट के कैंसर की शुरुआती पहचान में वरदान साबित हो सकता है.

