250th Independence Day: अमेरिका अपनी आजादी की 250वीं सालगिरह मना रहा है.4 जुलाई को अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा के 250 साल हुए. अमेरिका की आजादी से पूरी दुनिया को यह संदेश गया कि ब्रितानी हुकूमत को घुटनों पर लाया जा सकता है, उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ भी जंग जीती जा सकती है. उस वक्त महज 25 लाख की आबादी वाला यह देश, आज दुनिया की 25 फीसद इकॉनमी पर काबिज है. मानो अमेरिका अपनी किस्मत खुद लेकर आया हो.
दरअसल, ब्रिटेन से लड़ने के लिए फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट को धन की ज़रूरत थी. साल 1803 में तीसरे अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन ने बोनापार्ट से करीब 828,000 वर्ग मील जमीन केवल 1.5 करोड़ डॉलर में खरीद ली. जमीन के इस सौदे ने रातों-रात संयुक्त राज्य अमेरिका के भौगोलिक क्षेत्र को दोगुना कर दिया.
सौदे से बदली अमेरिका की सोच
मिसिसिपी नदी से लेकर रॉकी माउंटेन्स तक फैले इस विशाल क्षेत्र ने अमेरिका को दुनिया के सबसे समृद्ध कृषि मैदान और जलमार्ग सौंप दिए. लूसियाना खरीद से पहले, अमेरिका एक ‘तटीय और रक्षात्मक’ मानसिकता में जी रहा था. उसकी पूरी ताकत इस बात पर खर्च होती थी कि यूरोप की औपनिवेशिक ताकतें (ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन) उस पर दोबारा हमला न कर दें. इस सौदे ने अमेरिका की इस सोच को जड़ से बदल दिया. जब अमेरिका ने जान लिया कि वह अपने महाद्वीप में अजेय हो चुका है, तो उसने ठीक 20 साल बाद ‘मुनरो सिद्धांत’ की घोषणा की. इसमें अमेरिका ने यूरोपीय ताकतों को चेतावनी दी कि वे पश्चिमी गोलार्ध से दूर रहें, यहीं से अमेरिका के भीतर महाद्वीपीय शक्ति के रूप में वैश्विक भूमिका की चाह जगी.
अमेरिका कैसे बनता गया अजेय
दुनिया में कई क्रांतियां हुई हैं, लेकिन सफल कम ही हुई. क्रांति के उथल-पुथल के बाद एक टिकाऊ व्यवस्था बनाना, क्रांति करने से कहीं अधिक बड़ी चुनौती होती है. अमेरिका ने इसमें भी नज़ीर बनाई. जो ब्रिटेन स्वयं को आधुनिक लोकतंत्र की जननी कहता था, उसके समक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य का आदर्श दिया. इतिहास के उस मोड़ से अमेरिका आजादी का, लोकतंत्र का, अवसर का, नवाचार का, उदारवाद का, कॉस्मोपॉलिटन कल्चर, वैश्वीकरण का और संघीय संविधानवाद का एक अजेय प्रतीक बनकर उभरा.
ऐसा नहीं कि सब भाग्य के भरोसे हुआ. एक नए देश ने जब ‘अमेरिकन ड्रीम’ गढ़ा तो तीव्र औद्योगीकरण से गुजरा, सामाजिक जीवन में अस्त-व्यस्त से व्यवस्थित तक के गहरे संघर्ष हुए. गृह युद्ध ने करीब छह लाख बीस हज़ार ज़िन्दगियां छीन लीं. इसके बाद अमेरिका ने स्टील, रेल-रोड, उद्योग में अभूतपूर्व प्रगति की, तब तक प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया. अमेरिका की औद्योगिक प्रगति ने उसे विश्वयुद्ध में कमाई करने का मौका दे दिया. अमेरिका ने लीग ऑफ़ नेशंस की स्थापना में सहयोग दिया. लेकिन वह उसमें कभी शामिल नहीं हुआ.
अमेरिकी विदेश नीति का पैनापन यूरोप समेत पूरी दुनिया ने महसूस किया. 1929-1939 के ग्रेट डिप्रेशन (आर्थिक मंदी) ने अमेरिका को सिखाया कि अनियंत्रित बाजार देश का बेड़ा गर्क कर सकता है. पर्ल हार्बर के साथ ही अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में भी कूदा. दो जापानी शहरों की तबाही के साथ वह दुनिया की बड़ी सैन्य और औद्योगिक शक्ति के रूप में उभरा.