Israel US Iran War: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच भारत में काम कर रही ग्लोबल शराब कंपनियों ने सप्लाई में रुकावट के चलते कीमतों में बढ़ोतरी की चेतावनी दी है. इसकी सबसे बड़ी वजह गैस की कमी और आयात में आ रही बाधाएं हैं. गैस की कमी का सबसे बड़ा असर कांच की बोतल बनाने वाली इंडस्ट्री पर पड़ा है. हालांकि, भारत में शराब की कीमतें सख्ती से नियंत्रित होती हैं और इसके लिए राज्यों की मंजूरी जरूरी होती है.
मंजूरी के बिना कीमतें बढ़ाना संभव नहीं
करीब दो-तिहाई राज्यों की मंजूरी के बिना कीमतें बढ़ाना संभव नहीं है. जानकारी के मुताबिक, कांच बनाने वाली कंपनियों को अपना उत्पादन आंशिक या पूरी तरह से रोकना पड़ा है. इसके चलते बोतलों की कीमतों में करीब 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है. पैकेजिंग से जुड़ी दूसरी लागत भी बढ़ गई है. कागज के कार्टन की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं, जबकि लेबल और टेप जैसी सामग्री भी महंगी हो गई है.
एल्युमीनियम के आयात पर भी असर
शिपिंग में देरी के कारण एल्युमीनियम के आयात पर भी असर पड़ा है, जिससे कैन बनाने वाली कंपनियों को सप्लाई में कटौती की चेतावनी देनी पड़ी है. यह संकट ऐसे समय पर आया है. Heineken, Anheuser-Busch InBev और Carlsberg जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वालीब्रूअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कीमतों में 12 से 15 फीसदी तक बढ़ोतरी की मांग की है.
कुछ ऑपरेशंस को चलाना मुश्किल
एसोसिएशन के डायरेक्टर जनरल विनोद गिरी के अनुसार बढ़ती लागत के कारण कुछ ऑपरेशंस को चलाना मुश्किल होता जा रहा है. भारत का शराब बाजार तेजी से बढ़ रहा है. साल 2024 में इसका आकार करीब 7.8 अरब डॉलर आंका गया था और 2030 तक इसके दोगुना होने की उम्मीद है. बाजार में Heineken की हिस्सेदारी करीब आधी बताई जाती है, जबकि Anheuser-Busch InBev और Carlsberg की हिस्सेदारी लगभग 19-19 फीसदी है.
कीमतों में बदलाव की मांग
इसके अलावा बिरा और सिंबा जैसी कंपनियां भी तेजी से बाजार में सक्रिय हो रही हैं, लेकिन मौजूदा संकट ने इस बढ़ते बाजार पर अनिश्चितता के बादल ला दिए हैं. Confederation of Indian Alcoholic Beverage Companies ने भी राज्यों को पत्र लिखकर बढ़ती लागत के मद्देनजर कीमतों में बदलाव की मांग की है.
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