भारत अंतर‍िक्ष में बनाएगा अपना खुद का स्‍पेस स्‍टेशन, माइक्रोग्रेव‍िटी र‍िसर्च होगा सबसे अहम 

Aarti Kushwaha
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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ISRO privatisation: इसरो का फोकस इस समय अंतर‍िक्ष में अपना खुद का स्‍पेस स्‍टेशन बनाना है. लेकिन समस्या ये है कि अंतरिक्ष में पहुंचना जितनी बड़ी चुनौती है, उतनी ही बड़ी चुनौती वहां इंसानों के लंबे समय तक रहने की व्यवस्था तैयार करना है. हालांकि भारत ने इसी चुनौती का सामना करने के ल‍िए भारतीय अंतर‍िक्ष स्‍टेशन तैयार करने की द‍िशा में काम शुरू कर द‍िया है.
दरअसल, भारत साल 2035 तक अपना स्वदेशी भारतीय अंतर‍िक्ष स्टेशन (BAS) स्थापित करने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए ISRO ने इसकी पांच-मॉड्यूल वाली पूरी कॉनफ‍िग्रेशन तैयार कर ली है, जिसका पहला मॉड्यूल BAS-01 दो साल के भीतर यानी 2028 तक लॉन्च करने का लक्ष्य है.
बता दें कि अब तक अंतर‍िक्ष में इंटरनेशन स्पेस स्‍टेशन है, जहां रहकर अंतरिक्ष यात्री जरूरी र‍िसर्च कर रहे थे. लेकिन 2030 के अंत में ये स्‍टेशन खत्‍म कर द‍िया जाएगा. ऐसे में भारत का ये स्‍पेस स्‍टेशन न सिर्फ भारतीय वैज्ञानिकों के ल‍िए बल्‍कि दुन‍ियाभर के ल‍िए नई र‍िसर्च के ल‍िए अहम साब‍ित होगा. BAS पृथ्वी पर किसी अंतरिक्ष केंद्र की तरह एक जगह स्‍थाप‍ित नहीं होगा, बल्कि पृथ्वी के न‍िचले ऑर्ब‍िट (LEO) में पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाएगा.

क्‍या है भारत का अपना स्‍पेस स्‍टेशन?

ISRO के मुताबिक, BAS का उद्देश्य सिर्फ अंतरिक्ष में कुछ अंतरिक्ष यात्रियों को भेजना ही नहीं, बल्कि इस स्‍टेशन में इंसान के लंबे समय तक रहने के ल‍िए र‍िसर्च करने के ल‍िए पूरी व्‍यवस्‍था करना है. ये स्‍टेशन माइक्रोग्रेव‍िटी र‍िसर्च, मेड‍िस‍िन साइंस और एडवांस टेक्‍नॉलोजी र‍िसर्च के ल‍िए एक प्‍लेटफॉर्म की तरह काम करेगा. इसके अलावा, BAS का एक बड़ा उद्देश्य भविष्य में भारत के मानव अंतरिक्ष मिशनों और 2040 तक भारतीय एस्ट्रोनॉट को चांद पर उतारने के म‍िशन के ल‍िए तकनीकी आधार तैयार करना भी है. यही वजह है कि BAS को भारत के लंबे ह्यूमन स्‍पेसफ्लाइट प्रोग्राम की अगली बड़ी सीढ़ी माना जा रहा है.

2028 तक लॉन्च होगा BAS का पहला मॉड्यूल

ISRO की 2025-26 वार्ष‍िक र‍िपोर्ट में भी यही इस म‍िशन का रोडमैप दिया गया है. BAS के पहले मॉड्यूल को 2028 तक लॉन्च करना और 2035 तक पूरा स्‍टेशन स्थापित करना. इसी स्‍पेस सेंटर को देखते हुए इसरो ने 2040 तक भारतीय एस्‍ट्रोनॉट्स को चांद पर भेजने का लक्ष्‍य तय क‍िया है.
स्‍पेस ड‍िपार्टमेंट ने बताया था कि ISRO ने 5 मॉड्यूल वाले पूरी तरह भारतीय स्‍पेस स्‍टेशन की ऑवरऑल कॉनफिग्रेशन तैयार कर ली है और इसे नेशनल लेवल की रिव्‍यू कमेटी ने र‍िव्‍यू भी किया है. इसके बाद मार्च 2026 में सरकार ने स्पष्ट किया कि BAS का पहला module BAS-01 साल 2028 तक लॉन्च करने का लक्ष्य है. हालांकि ISRO ने अभी सार्वजनिक रूप से हर मॉड्यूल का पूरा नाम, इंटरनल लेआउट और उसकी फाइनल पूरी डिटेल भूमिका के बारे में नहीं बताया है.
ISRO ने बताया कि इस स्‍टेशन को फेज में धरती पर ही बनाया जाएगा और फिर असेंबल किया जाएगा. यानी अलग-अलग मॉड्यूल्‍स को अलग-अलग लॉन्‍च कर भेजने की तैयारी है. इसे ऐसे समझा जा सकता हैं कि जैसे ऑनलाइन ऑर्डर की गई क‍िसी बड़ी टेबल या बेड की ड‍िलेवरी के वक्‍त उसके पार्ट जोड़े जाते हैं. वैसे ही इस स्‍टेशन को अलग-अलग मॉड्यूल में तैयार कर स्‍पेस में ही असेंबल क‍िया जाएगा. यही वजह है कि इस असेंबल‍िंग को करने के ल‍िए स्‍पेस डॉकिंग टेक्‍नेलॉजी बेहद महत्वपूर्ण है.

कैसे मानव इतिहास और भव‍िष्‍य के राज खोलेगी ये र‍िसर्च?

इस दौरान BAS का सबसे महत्वपूर्ण काम माइक्रोग्रेव‍िटी र‍िसर्च करना होगा, जो मानव सभ्‍यता के भूतकाल और भव‍िष्‍य दोनों के राज खोलेगी. दरअसल, अंतरिक्ष में ग्रेविटी का प्रभाव पृथ्वी की तुलना में बहुत अलग होता है. ऐसे में यहां कुछ एक्‍सपेरिमेंट्स ऐसे किए जा सकते हैं जो पृथ्वी पर उसी तरह संभव नहीं होते. बता दें कि माइक्रोग्रेविटी में मानव शरीर का व्‍यवहार, धरती से ब‍िलकुल अलग होता है. लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने पर शरीर, मसल्‍स, हड्ड‍ियों, फ्लूइड और कई बाइलॉज‍िकल प्रोसेस में बदलाव आते हैं. इसीलिए इस स्‍पेस स्‍टेशन पर जीवन और मेडिसिन से जुड़े प्रयोग मानव शरीर से जुड़े ऐसे राज खोल सकते हैं, जो हमें अभी तक नहीं पता हैं. इससे पहले अंतर‍िक्ष में कुछ बीजों को उगाकर उन्‍हें धरती पर लाकर फ‍िर से लगाने के प्रयोग पहले से ही इसरो कर रहा है.

BAS में लंबे समय तक रह पाएंगे इंसान

भारत के इस BAS प्रोग्राम का यह एक बड़ा उद्देश्य एडवांस लाइफ सपोर्ट स‍िस्‍टम जैसी तकनीक होगी जो Low Earth Orbit में लंबे समय तक इंसानों के रहने को संभव बनाएगी. यानी जहां एक तरफ गगनयान जहां भारतीय एस्‍ट्रोनॉट्स को सुरक्षित रूप से अंतरिक्ष में भेजने और वापस लाने की क्षमता रख रहा है, वहीं BAS का लक्ष्य अंतरिक्ष में इंसान के लंबे समय तक रहने और र‍िसर्च करने के सपने को पूरा करने की द‍िशा में उठाया अहम कदम है. इस स्‍टेशन की मदद से अंतर‍िक्ष में रहकर लंबे र‍िसर्च क‍िए जा सकेंगे.
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