Lenacapavir: भारत एक बार फिर दुनिया के गरीब मुल्कों के लिए मसीहा बनकर सामने आया है, जिससे करीब 120 देशों को एक तरह का जीवनदान मिलेगा. भारत की इस पहल के सामने अमेरिका भी नतमस्तक हो गया है. दरअसल, अमेरिकी नियामक संस्था ने एचआईवी से बचाने वाली दवा लेनाकैपैविर (Lenacapavir) के एक जेनरिक वर्जन को मंजूरी दे दी है. यह लंबे समय तक प्रभावी रहने वाली एचआईवी से बचाव की दवा है.
बता दें कि यह भारतीय जेनरिक दवा गरीब और निम्न आय वाले देशों में बेची जाएगी. इससे इस बेहद जरूरी दवा तक दुनिया की गरीब और कम आय वाली आबादी की पहुंच सुनिश्चित हो सकेगी. भारत की इस पहल को मानवता की सेवा का एक अद्भुत उदाहरण माना जा रहा है. हालांकि पहले भी भारत दुनिया की महंगी दवाओं का जेनरिक वर्जन बनाकर उसे सस्ते में उपलब्ध करवाता रहा है. इससे अफ्रीकी और विकासशील देशों के लोगों को बड़ी राहत मिली है.
लेनाकैपैविर के जेनरिक वर्जन को सशर्त मंजूरी
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने भारतीय दवा कंपनी डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज की लेनाकैपैविर के जेनरिक वर्जन को सशर्त मंजूरी दी है. यह एचआईवी संक्रमण से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली लंबे समय तक प्रभावी रहने वाली दवा है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे रोज खाने की जरूरत नहीं होती. साल में सिर्फ दो इंजेक्शन लगवाकर एचआईवी संक्रमण का जोखिम कम किया जा सकता है.
आपको बता दें कि यह दवा उन लोगों के लिए खास तौर पर उपयोगी हो सकती है, जिन्हें एचआईवी संक्रमण का खतरा अधिक है. फिलहाल बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली कई दवाएं रोज लेनी पड़ती हैं. नियमित रूप से दवा नहीं लेने पर सुरक्षा प्रभावित हो सकती है. लेनाकैपैविर इस चुनौती को काफी हद तक दूर करने की उम्मीद जगाती है.
कई क्लिनिकल परीक्षणों के नतीजे भी उत्साहजनक
इस दवा के असर को लेकर हुए बड़े क्लिनिकल परीक्षणों के नतीजे भी उत्साहजनक रहे हैं. इनमें एचआईवी संक्रमण से बचाव में इसकी प्रभावशीलता करीब 100 फीसदी के आसपास रही. हालांकि, इसे एचआईवी का इलाज या संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं समझना चाहिए.
क्या है जेनरिक लेनाकैपैविर की कीमत
इस दवा की कीमत इसे दुनिया के गरीब देशों के लिए और महत्वपूर्ण बनाती है. तय समझौते के तहत जेनरिक लेनाकैपैविर की कीमत करीब 40 डॉलर यानी लगभग 3,500 रुपये सालाना प्रति व्यक्ति रखी गई है. यह कीमत उन 120 कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए तय की गई है, जो संबंधित स्वैच्छिक लाइसेंस समझौते के दायरे में आते हैं.
इसके उलट, अमेरिका में मूल ब्रांडेड दवा की कीमत करीब 28,218 डॉलर सालाना है. भारतीय जेनरिक दवा की प्रस्तावित कीमत इससे बहुत कम है. हालांकि, दोनों कीमतों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अमेरिकी कीमत ब्रांडेड दवा की है, जबकि 40 डॉलर की कीमत संबंधित देशों के लिए जेनरिक दवा की तय व्यवस्था के तहत है.
इन संस्थाओं ने निभाई अहम भूमिका
इस पहल में डॉ. रेड्डीज के साथ वैश्विक स्वास्थ्य संगठन यूनिटेड, क्लिंटन हेल्थ एक्सेस इनिशिएटिव और अफ्रीका का स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान विट्स आरएचआई शामिल रहे हैं. इन संस्थाओं ने दवा के विकास, नियामकीय प्रक्रिया और इसे कम कीमत पर उपलब्ध कराने में सहयोग किया है.
FDA ने दिया दवा को टेंटेटिव अप्रूवल
अमेरिकी नियामक की मंजूरी को इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है. FDA ने दवा को टेंटेटिव अप्रूवल दिया है. इसका मतलब है कि दवा गुणवत्ता और नियामकीय मानकों के लिहाज से मंजूरी की प्रक्रिया में सफल रही है, लेकिन मूल दवा के पेटेंट और दूसरे कानूनी प्रतिबंधों के कारण इसे अमेरिका में बेचा नहीं जा सकता.
इस मंजूरी से उन देशों में दवा की उपलब्धता का रास्ता आसान हो सकता है, जो संबंधित लाइसेंस समझौते के दायरे में आते हैं. इसके बावजूद अलग-अलग देशों में स्थानीय नियामकीय मंजूरी, खरीद और वितरण की व्यवस्था जरूरी होगी. डॉ. रेड्डीज इस दवा के लिए मंजूरी पाने वाली छह लाइसेंसधारी जेनरिक कंपनियों में पहली कंपनी बनी है. इससे भारतीय दवा उद्योग की जटिल दवाएं विकसित करने और उन्हें बड़े पैमाने पर बनाने की क्षमता भी सामने आई है.
वैश्विक स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपलब्धि
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में करीब 4.1 करोड़ लोग एचआईवी के साथ जी रहे थे. इसी साल एचआईवी से जुड़ी बीमारियों के कारण करीब 5.70 लाख लोगों की मौत हुई. ऐसे में बचाव की प्रभावी दवा को सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराना वैश्विक स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह दवा उन लोगों तक पहुंचती है, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, तो नए संक्रमणों की संख्या घटाने में मदद मिल सकती है. लेकिन सिर्फ दवा की मंजूरी से एचआईवी महामारी खत्म नहीं होगी. इसके लिए पर्याप्त धन, नियमित जांच, जागरूकता और जरूरतमंद लोगों तक दवा पहुंचाने की मजबूत व्यवस्था भी जरूरी है.