PAK, सऊदी और तुर्की के मक्का समझौते में कई विरोधाभास, आखिर ये कैसे रहेंगे एकजुट? रिपोर्ट में बडा दावा

New Delhi: पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के बीच हुए मक्का समझौते में दरार दिखने वाली है. इसमें कई विरोधाभास हैं. इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और मूल्यों में भी समानता नहीं है. एक रिपोर्ट में समझौते में मौजूद खामियों को उजागर किया है. रिपोर्ट के मुताबिक कोई साझा मूल्य, समान हित या खतरे को लेकर एक जैसी सोच और किसी साझा दुश्मन के न होने के कारण, इस त्रिपक्षीय समझौते के सामने यह बुनियादी सवाल है कि आखिर ये एकजुट कैसे रहेंगे?

अमेरिकी ठिकानों को बार-बार बनाया निशाना

कनाडा स्थित जियोपॉलिटिकल मॉनिटर की एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान युद्ध मध्य पूर्व की भू-राजनीति को बदल रहा है. खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को बार-बार निशाना बनाया गया है. अमेरिका समुद्री यातायात और ऊर्जा की आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से खोलने में असमर्थ रहा है. इसने मध्य पूर्व के देशों को वाशिंगटन से हटकर अपने रक्षा साझेदारों में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है. इस बदलती रणनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण अगस्त की शुरुआत में देखने को मिला, जब सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए.

सुरक्षा समझौते के तौर पर पेश

मक्का समझौते को नाटो जैसे सुरक्षा समझौते के तौर पर पेश किया जा रहा है, जिसमें नाटो के अनुच्छेद 5 जैसा ही प्रावधान है. इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर भी सशस्त्र हमले को उन सभी पर हमला माना जाएगा. मक्का समझौते में मौजूद विरोधाभास को उजागर करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समूह के कुछ सदस्यों के संबंध एक-दूसरे के दुश्मनों के साथ गहरे हैं. इसमें सवाल उठाया गया है कि क्या सऊदी अरब, जिसने पिछले दशक में भारत के साथ अपने संबंधों को काफी मजबूत किया है. नई दिल्ली के साथ भविष्य के किसी संघर्ष में पाकिस्तान का समर्थन करेगा?

युद्ध में शामिल न होने के पक्ष में मतदान

रिपोर्ट में कहा गया है कि अतीत में रियाद ने इस्लामाबाद से यमन युद्ध के लिए सैनिक, जहाज और विमान भेजने को कहा था. हालांकि पाकिस्तान की संसद ने युद्ध में शामिल न होने के पक्ष में मतदान किया. हर देश युद्ध और शांति के मामलों पर अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विचार करता है और इसलिए इस बात को लेकर आशंकाएं हैं कि क्या तीनों देश एक-दूसरे की मदद करेंगे या नहीं. और अगर वे अपने साथी हस्ताक्षरकर्ता देश की मदद करने का फैसला भी करते हैं तो वे किस हद तक मदद करेंगे, यह एक खुला सवाल बना हुआ है.

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