Nepal Violence: नेपाल के सुनसरी जिले के देवानगंज से शुरू हुई सांप्रदायिक हिंसा अब राजनीतिक संकट का रूप लेती हुई दिख रही है. इस हिंसा में पुलिस फायरिंग के दौरान 3 लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और गृह मंत्री सुदान गुरुंग को जवाब देही मांगी जा रही है. दोनों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. वहीं कई इलाको में अभी भी तनाव जारी है, जिस कारण वहां कर्फ्यू लगा है.
वहीं, एक्सपर्ट्स मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि यदि सरकार ने शुरुआत में ही राजनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप किया होता तो हालात इतने नहीं बिगड़ते. रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा की शुरुआत दो समुदायों के बीच कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे बजाने को लेकर हुए विवाद से हुई थी. इसके बाद तनाव सुनसरी से निकलकर सप्तरी, सिराहा, धनुषा और पर्सा तक फैल गया. कई इलाकों में कर्फ्यू लगाना पड़ा और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए.
सरकार पर क्या हैं आरोप?
इस घटना पर आलोचकों का कहना है कि हिंसा के शुरुआती दिनों में ही सरकार को स्थानीय जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और सामुदायिक नेताओं के साथ मीटिंग करनी चाहिए थी, जो सरकार ने नहीं की. उनका आरोप है कि प्रशासन ने तनाव कम करने के बजाय कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुख्य रूप से सुरक्षा बलों पर भरोसा किया.
रिपोर्ट के मुताबित, गृह मंत्री ने शुरुआती सुरक्षा बैठक तो बुलाई, लेकिन प्रधानमंत्री Balendra Shah ने घटना के चार दिन बाद नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के प्रमुखों से औपचारिक जानकारी ली. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक भी पांचवें दिन बुलाई गई. इस दौरान न तो प्रधानमंत्री और न ही गृह मंत्री ने तुरंत प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया. गृह मंत्री पांच दिन बाद सुनसरी पहुंचे, जबकि प्रधानमंत्री ने लोगों से शांति बनाए रखने की अपील वाला वीडियो संदेश जारी किया.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सुरक्षा एजेंसियों ने करीब 3 साल पहले ही इस इलाके में सांप्रदायिक तनाव की आशंका जताई थी. इसके बाद भी स्थानीय स्तर पर मिले इनपुट के आधार पर समय रहते कदम नहीं उठाए गए. पूर्व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सदस्य और अधिवक्ता मोहना अंसारी ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने शुरू से ही सुनसरी की घटना को उतनी गंभीरता से क्यों नहीं लिया, जितनी जरूरत थी? एक स्थानीय विवाद उस स्थिति तक कैसे पहुंच गया कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी? जब साफ था कि तनाव दूसरे इलाकों में फैल सकता है, तब राजनीतिक स्तर पर संवाद क्यों नहीं शुरू किया गया?’
तीन लोगों की मौत, कई घायल
बता दें कि रविवार को शुरू हुई झड़प के दौरान पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें 30 वर्षीय ओम प्रकाश मेहता की मौत हो गई, जबकि 9 लोग गंभीर रूप से घायल हुए. वहीं, बाद में इलाज के दौरान 20 वर्षीय जय प्रकाश मेहता ने भी दम तोड़ दिया. इसके बाद सिराहा के गोलबाजार में प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस फायरिंग में 17 वर्षीय गणेश यादव की भी मौत हो गई.
संसद में भी गूंजा मामला
इसके अलावा, नेपाल की प्रतिनिधि सभा में भी यह मुद्दा जोरदार तरीके से उठा. इस दौरान विपक्षी सांसदों ने सरकार से जवाब मांगा कि हिंसा को रोकने के लिए समय रहते क्या कदम उठाए गए. पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने संसद में कहा, ‘सुनसरी, मोरंग और अन्य इलाकों की स्थिति को संवाद और सहयोग से सुलझाया जाना चाहिए. समाज को बांटने की कोशिश करने वालों के खिलाफ लोगों को एकजुट रहना होगा. आखिरकार सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, लेकिन इसकी पहल प्रधानमंत्री को करनी चाहिए थी. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री, दोनों की गैरमौजूदगी बेहद चिंताजनक है.’
सोशल मीडिया और खुफिया तंत्र पर भी सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा के बाद सोशल मीडिया पर कथित भड़काऊ कंटेंट फैलने से हालात और बिगड़े. आलोचकों का कहना है कि सुरक्षा एजेंसियां समय रहते ऐसी सामग्री पर रोक लगाने में नाकाम रहीं. हालांकि नेपाल पुलिस के प्रवक्ता अभिनारायण काफ्ले ने कहा कि पुलिस एआई आधारित तकनीक की मदद से सोशल मीडिया की निगरानी कर रही है और भ्रामक या भड़काऊ कंटेंट फैलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.