New Delhi: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार पाने का सपना फिर से टूट गया है. नॉर्वे की राजधानी ओस्लो से जब 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान हुआ तो पूरी दुनिया की नज़रें टेलीविजन स्क्रीन पर टिकी थीं. एक तरफ ट्रंप का खेमा इस उम्मीद में था कि इस बार ओस्लो से उनके नाम की आधिकारिक मुहर लगेगी तो दूसरी तरफ मानवाधिकारों की शांत मगर बेहद मजबूत लड़ाई लड़ने वाली हस्तियों के नाम चर्चा में थे.
अंतरराष्ट्रीय कानून की सालों की ‘खामोश’ तपस्या भारी
लेकिन जैसे ही नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने घोषणा की, पुरस्कार भारतीय मूल की दिग्गज न्यायविद और संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख नवनेथम नावी पिल्लई के खाते में चला गया. इस एक घोषणा के साथ ही अमेरिकी राजनीति के सबसे बड़े ‘लाउड’ दावों पर शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून की सालों की ‘खामोश’ तपस्या भारी पड़ गई. ये ट्रंप के नोबेल वाले सपने पर दूसरा बड़ा झटका है और इसने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि नोबेल शांति पुरस्कार सिर्फ हेडलाइन्स या राजनीतिक बयानों के आधार पर नहीं, बल्कि धरातल पर किए गए स्थायी काम के आधार पर दिया जाता है.
‘डीलमेकर’ के रूप में किया पेश
डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में खुद को एक ऐसे ‘डीलमेकर’ के रूप में पेश किया है जो किसी भी युद्ध को पलक झपकते ही रुकवा सकते हैं. चुनाव प्रचार से लेकर रैलियों तक, ट्रंप और उनके समर्थक लगातार ये दावा करते रहे हैं कि उन्होंने दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए बेहतरीन काम किया है. ट्रंप ने बार-बार कम से कम 8 जंग खत्म कराने दावा किया है, जबकि वो खुद ईरान के साथ युद्ध लड़ रहे हैं. उनकी सरकार में अमेरिका कई वॉर क्राइम के आरोप लगे हैं.
सीजफायर का क्रेडिट भी ट्रंप ही लेते हैं
सिर्फ यही नहीं भारत-पाकिस्तान के बीच मई में हुई जंग के बाद सीजफायर का क्रेडिट भी ट्रंप ही लेते हैं. जबकि भारत ने बार-बार कहा है कि पाकिस्तान ने खुद सीजफायर की भीख मांगी थी और किसी तीसरे देश का इसमें कोई हाथ नहीं है. चाहे पश्चिम एशिया के समीकरण हों या उत्तर कोरिया से बातचीत, ट्रंप का दांव हमेशा बड़े-बड़े कूटनीतिक शोमैनशिप पर रहा. लेकिन नोबेल समिति का मिजाज ट्रंप के इस स्टाइल से बिल्कुल अलग दिखा.
पिल्लई का जीवन किसी मिसाल से कम नहीं
80 के दशक को पार कर चुकीं भारतीय मूल की नावी पिल्लई का जीवन किसी मिसाल से कम नहीं है. दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं नावी पिल्लई का परिवार तमिल बैकग्राउंड से आता है. उन्होंने जिस दौर में अपनी वकालत शुरू की, उस समय दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था. रंगभेद के खिलाफ लड़ाई नस्लीय भेदभाव के दौर में अश्वेतों और रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं को कानूनी सुरक्षा दी.
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