Islamabad: आखिरकार कट्टरपंथी संगठनों और मजहबी विरोध के दबाव में पाकिस्तानी सरकार झुक गई है. फिलहाल, लाहौर में सड़कों और गलियों के पुराने ऐतिहासिक नाम बहाल करने की योजना रोक दी गई है. लाहौर के उपायुक्त ने कहा कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है और मामला विचाराधीन है. पंजाब प्रांत की मरियम नवाज सरकार ने हाल ही में लाहौर की कई ऐतिहासिक सड़कों और इलाकों के विभाजन-पूर्व नाम दोबारा बहाल करने की योजना बनाई थी.
ऐतिहासिक पहचान पुनर्जीवित करना
इसका उद्देश्य शहर की पुरानी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करना था. इस मुद्दे पर पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के प्रमुख Nawaz Sharif और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज की मौजूदगी में बैठक भी हुई थी. मुख्यमंत्री कार्यालय ने 20 मार्च को इस फैसले से जुड़ी आधिकारिक जानकारी मीडिया को दी थी. लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई कि कई सड़कों और गलियों को उनके पुराने हिंदू और सिख नामों से फिर पहचाना जाएगा, कट्टरपंथी तत्वों ने इसका विरोध शुरू कर दिया.
फैसले को बनाया मजहबी मुद्दा
विरोधियों ने इस फैसले को मजहबी मुद्दा बना दिया. बढ़ते विरोध और विवाद को देखते हुए मरियम नवाज प्रशासन ने फिलहाल इस योजना को टाल दिया है. लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल परियोजना के तहत जिन इलाकों और सड़कों के नाम बहाल करने पर चर्चा थी, उनमें कृष्ण नगर, संत नगर, धरमपुरा, राम गली, लक्ष्मी चौक, जैन मंदिर रोड, मोहन लाल बाजार, सुंदर दास रोड, भगवानपुरा और शांति नगर जैसे नाम शामिल थे.
पहचान केवल आधुनिक पाकिस्तान तक सीमित नहीं
इसके अलावा क्वीन्स रोड, जेल रोड, डेविस रोड, लॉरेंस रोड और एम्प्रेस रोड जैसी पुरानी औपनिवेशिक पहचान वाली सड़कों के नाम भी बहस का हिस्सा बने हुए थे. पाकिस्तान के इतिहासकारों और शहरी योजनाकारों का कहना है कि लाहौर की पहचान केवल आधुनिक पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर हिंदू, सिख और मुस्लिम संस्कृतियों की साझा विरासत रहा है. यह मामला अब पाकिस्तान में इतिहास, पहचान और कट्टरपंथ की बहस का नया मुद्दा बन गया है.
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