Pakistan Military: इस्लामाबाद में पाकिस्तानी सत्ता, सेना और कट्टरपंथी नेटवर्क के बीच बढ़ते गठजोड़ की तस्वीर सामने आई है. खुफिया सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष और सरकार समर्थित धर्मगुरु हाफिज ताहिर महमूद अशरफी ने मरकज कुबा में संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित वैश्विक आतंकी हाफिज सईद के बेटे हाफिज तलहा सईद के साथ हाई-प्रोफाइल बैठक की. यह बैठक ऐसे समय में हुई है, जब जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फ) प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान लगातार पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की नीतियों, आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था और शासन की विफलताओं पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं.
सुत्रों के मुताबिक, ताहिर महमूद और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के नेताओं के बीच दिन-दहाड़े हुई इस रणनीतिक बैठक का उद्देश्य फज़लुर रहमान के बढ़ते राजनीतिक हमलों का संयुक्त जवाब तैयार करने के साथ सेना समर्थक धार्मिक मोर्चे को मजबूत करना था. जानकारो का मानना है कि इस घटनाक्रम ने एक बार फिर उन आरोपों को हवा दे दी है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथी संगठनों और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच संबंध अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं.
क्या है गठबंधन का मकसद
सेना से जुड़े इस गठबंधन का मकसद फजलुर रहमान के प्रति “नरम रुख” और रणनीतिक ढील अपनाना है, जिससे बड़े टकराव को भड़काए बिना उनके राजनीतिक प्रभाव को कम किया जा सके. वहीं, बैठक में मौजूद LeT के लोगों ने धर्मगुरुओं से कहा कि वे JUI-F प्रमुख के करियर के सकारात्मक पहलुओं को उजागर करें, इसके साथ ही सरकारी संस्थानों के खिलाफ़ बोलने पर कड़ी चेतावनी भी दें.
इतना ही नहीं, उन्होंने ये भी कहा कि पारंपरिक धार्मिक-राजनीतिक हस्तियों को संभालने के लिए जिहादी नेटवर्क का सहारा लेकर, रावलपिंडी कट्टरपंथी तत्वों का इस्तेमाल एक घरेलू सुरक्षा कवच (फायरवॉल) के तौर पर कर रहा है, ताकि ‘डीप स्टेट’ को बढ़ते राजनीतिक विरोध से बचाया जा सके.
आतंकवादियों का समर्थन कर रहा पाकिस्तान
सुत्रों के मुताबिक, ताहिर अशरफी और LeT नेताओं के बीच खुली बातचीत इस बात का साफ़ सबूत है कि पाकिस्तान का सैन्य तंत्र घोषित आतंकवादियों को मुख्यधारा में लाने का काम जारी रखे हुए है; वे उन्हें सिर्फ बाहरी प्रॉक्सी (प्रतिनिधि) के तौर पर नहीं, बल्कि देश के भीतर मौजूद राजनीतिक संपत्तियों के तौर पर देखते हैं. फजलुर रहमान जैसी हस्तियों को रोकने के लिए चरमपंथी नेटवर्क का इस्तेमाल रावलपिंडी की अंदरूनी राजनीतिक कमजोरी को उजागर करता है. इससे पता चलता है कि जब पारंपरिक राजनीतिक तरीके काम नहीं आते, तो ‘डीप स्टेट’ अपनी सत्ता बचाने और राष्ट्रीय नैरेटिव (विमर्श) को आकार देने के लिए कट्टरपंथी प्रॉक्सी पर निर्भर हो जाता है.